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118 40449664 ?सम्पूर्ण भारतवर्ष जैन मुनि विहार एवं माता जी विहार समूह ?और गणमान्यगण? 2026-02-12 06:48:58
117 40449664 ?सम्पूर्ण भारतवर्ष जैन मुनि विहार एवं माता जी विहार समूह ?और गणमान्यगण? 2026-02-12 06:48:57
116 40449729 माँ विशुद्ध भक्त परिवार?7 *आँखें ही सुख और दुःख का कारण हैं।*?? *प. पू. प्रज्ञा पद्मिनी पट्ट गणिनी आर्यिका 105 श्री विज्ञमति माताजी*?? 2026-02-12 06:47:54
115 40449721 माँ विशुद्ध भक्त परिवार?6 *आँखें ही सुख और दुःख का कारण हैं।*?? *प. पू. प्रज्ञा पद्मिनी पट्ट गणिनी आर्यिका 105 श्री विज्ञमति माताजी*?? 2026-02-12 06:47:50
114 40449728 Vishuddh Vigya Sangh ? *आँखें ही सुख और दुःख का कारण हैं।*?? *प. पू. प्रज्ञा पद्मिनी पट्ट गणिनी आर्यिका 105 श्री विज्ञमति माताजी*?? 2026-02-12 06:47:38
113 40449725 विशुद्ध विज्ञ संघ ?अपडेट *आँखें ही सुख और दुःख का कारण हैं।*?? *प. पू. प्रज्ञा पद्मिनी पट्ट गणिनी आर्यिका 105 श्री विज्ञमति माताजी*?? 2026-02-12 06:47:37
112 40449657 ?️?SARVARTHASIDDHI ??️ <a href="https://youtu.be/4rsOs_yDv5U?si=mJdj0UEw04RCpSyk" target="_blank">https://youtu.be/4rsOs_yDv5U?si=mJdj0UEw04RCpSyk</a> 2026-02-12 06:43:16
111 47534159 Maharstra (kartick) *आत्मचिंतन - (नं. 2529)* ******************************* *श्रीतत्त्वार्थसूत्र तथा मोक्षशास्त्र* ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ (*176*) *श्रीतत्त्वार्थसूत्र* उर्फ़ *मोक्षशास्त्र* एक बहुत ही महत्वपूर्ण ग्रन्थ / आगम / शास्त्र है, जो जैन दर्शन का खूबसूरती से विश्लेषण करता है। हम इसकी व्याख्या स्टेप बाय स्टेप समझ रहे हैं - *॥ दूसरा अध्याय ॥* *अविग्रहा जीवस्य ॥* (अध्याय 2 / सूत्र 27) *अ विग्रहा जीवस्य ॥ 2/27॥* *मतलब -* ~~~~~~~ *=&gt; अ विग्रह -* एक गति से दूसरी गति में जाकर शरीर धारण करने की गति को विग्रह गति कहते हैं, यह हमने सूत्र नंबर 1/25 में देखा है। अब इस सूत्र में *अविग्रह* शब्द आया है। इसका मतलब है कि, *"जो जीव मुक्त हो जाते हैं, ऐसे मुक्त आत्माओं की गति सीमित नहीं होती, ऐसी आत्माएं सीधी चलती हैं। आत्मा सात राजू उपर एक ही समय में मध्यलोक से सीधी गमन करती / चलती हैं और सिद्धशिला पर विराजमान हो जाती हैं।"* ..इसलिए, *ऐसी भव्य आत्माओं को मध्यलोक से सिद्धशिला तक जो गति मिलती है, वह "अविग्रह गति" है यानी सीधी गति। ऐसी भव्य आत्माओं की यही खासियत होती है।* [ *ज़रूरी -* किसी भी सिद्ध क्षेत्र पर सिर्फ़ चरण पादुका होती हैं, हमें पहले उनके दर्शन करते है / करने चाहिए और वहाँ से सीधे ऊपर (समकोण पर) देखते हुए, सिद्ध शिला पर विराजमान परम श्रेष्ठ सिद्ध परमेष्ठी को वंदन करते है / करना चाहिए।] *(क्रमशः) ( ता. 12/02/2026)* *--डॉ. अजीत जे. पाटिल जैन, सांगली, महाराष्ट्र* ??? (कु.9038/आ.3193) 2026-02-12 06:42:56
110 40449749 जिनोदय?JINODAYA शाबाश इंडिया ?? पत्रिका में मेरा लेख 2026-02-12 06:37:40
109 40449705 ☸️ अच्छीबातेअमृतवाणी ग्रुप 2026-02-12 06:36:48