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72964 40449687 अध्यात्मयोगी <a href="https://youtube.com/live/SJVKI0QY5ro?feature=share" target="_blank">https://youtube.com/live/SJVKI0QY5ro?feature=share</a> _*?54#शुद्धोपयोग भावना के सामर्थसे अत्यन्त नीरस होते हुए ही कर्म पुद्गलोंका एकदेश खिर जाना।?आगम वचन के रहस्य?-पं.अनिलजी,पुणे।*_ *#गाथा सूत्र२७?जितना आकाश अविभागी पुद्गलाणु से रोका जाता है उसे सर्व अणुओंको स्थान देनेमें योग्य प्रदेश जानो।* *#एकदेश शुद्धनिश्चयनय?(१)आगमभाषासे रत्नत्रय की एकदेश व्यक्तता (गु ४ से गु १४)=भव्यत्व पारिणामिक- -भावकी व्यक्तता/प्रगटता &amp; (२)अध्यात्म- -भाषासे-द्रव्यशक्तिरुप शुद्धपारिणामिक भावकी भावना= निर्विकल्प समाधि= शुद्धोपयोग।* *#ध्यान=भावना=नित्यानित्यार्थक्रिया? सादिसांत= विनाशीक &amp; ध्येयरुप शुद्ध पारिणामिक -भाव द्रव्यरुप होनेसे अविनाशी/अनादि-अनंत ? इस आगम टीका वचन से 'ध्यान का ध्येय अत्यन्त शुद्ध नित्यार्थक्रिया- रहित संयुक्त ही होता हैं, अन्यथा अशुद्ध' होता हैं ऐसा आचार्य भगवान क्यौं संकेत कर रहे हैं?* *#जीव और पुद्गल के संयोगपरिणामरुप विभावपर्याय से उत्पन्न?आस्त्रव,बंध, पुण्य और पाप।* *#संवर,निर्जरा, मोक्ष, पुण्यानुबंधी पुण्य?जीव और पुद्गल के संयोगपरिणामरुप विभावपर्याय के विनाश से उत्पन्न की कालप्रत्यासत्ति त्रिकाली गुणों की पर्यायगत स्वभावपर्यायमय नित्यानित्यार्थक्रिया के साथ नियम से कैसे होती हैं?* *#गाथा सूत्र२८?आस्त्रव, बंध, संवर, निर्जरा, मोक्ष, पुण्य और पापरुप जो पदार्थ जीव और अजीव द्रव्यके विशेष हैं, उन्हे भी हम संक्षेपमें कहते हैं।? आस्त्रव=शुभाशुभ परिणाम? इस आगम वचन से शुभोपयोग आस्त्रव का कारण है, संवर का नहीं यह पुन:हा सिद्ध हो गया।, संवर= शुभाशुभ भावकर्म&amp; द्रव्यकर्म के आगमन रोकने में समर्थ स्वानुभवरुप विशुद्ध परिणाम, णिज्जर= शुद्धोपयोग भावना के सामर्थसे अत्यन्त नीरस होते हुए कर्म पुद्गलोंका एकदेश खिर जाना। निर्जरा की व्याख्या में नीरस होते हुए कर्म पुद्गलोंका खिरना इस आगम वचन में कौंन२ से रहस्य छिपे हुए हैं?* *#बृहद-द्रव्यसंग्रह गाथा सूत्र २७,२८ पृष्ठ क्रं ९६ से ९८।* 2026-04-09 19:43:11
72963 40449687 अध्यात्मयोगी <a href="https://youtube.com/live/SJVKI0QY5ro?feature=share" target="_blank">https://youtube.com/live/SJVKI0QY5ro?feature=share</a> _*?54#शुद्धोपयोग भावना के सामर्थसे अत्यन्त नीरस होते हुए ही कर्म पुद्गलोंका एकदेश खिर जाना।?आगम वचन के रहस्य?-पं.अनिलजी,पुणे।*_ *#गाथा सूत्र२७?जितना आकाश अविभागी पुद्गलाणु से रोका जाता है उसे सर्व अणुओंको स्थान देनेमें योग्य प्रदेश जानो।* *#एकदेश शुद्धनिश्चयनय?(१)आगमभाषासे रत्नत्रय की एकदेश व्यक्तता (गु ४ से गु १४)=भव्यत्व पारिणामिक- -भावकी व्यक्तता/प्रगटता &amp; (२)अध्यात्म- -भाषासे-द्रव्यशक्तिरुप शुद्धपारिणामिक भावकी भावना= निर्विकल्प समाधि= शुद्धोपयोग।* *#ध्यान=भावना=नित्यानित्यार्थक्रिया? सादिसांत= विनाशीक &amp; ध्येयरुप शुद्ध पारिणामिक -भाव द्रव्यरुप होनेसे अविनाशी/अनादि-अनंत ? इस आगम टीका वचन से 'ध्यान का ध्येय अत्यन्त शुद्ध नित्यार्थक्रिया- रहित संयुक्त ही होता हैं, अन्यथा अशुद्ध' होता हैं ऐसा आचार्य भगवान क्यौं संकेत कर रहे हैं?* *#जीव और पुद्गल के संयोगपरिणामरुप विभावपर्याय से उत्पन्न?आस्त्रव,बंध, पुण्य और पाप।* *#संवर,निर्जरा, मोक्ष, पुण्यानुबंधी पुण्य?जीव और पुद्गल के संयोगपरिणामरुप विभावपर्याय के विनाश से उत्पन्न की कालप्रत्यासत्ति त्रिकाली गुणों की पर्यायगत स्वभावपर्यायमय नित्यानित्यार्थक्रिया के साथ नियम से कैसे होती हैं?* *#गाथा सूत्र२८?आस्त्रव, बंध, संवर, निर्जरा, मोक्ष, पुण्य और पापरुप जो पदार्थ जीव और अजीव द्रव्यके विशेष हैं, उन्हे भी हम संक्षेपमें कहते हैं।? आस्त्रव=शुभाशुभ परिणाम? इस आगम वचन से शुभोपयोग आस्त्रव का कारण है, संवर का नहीं यह पुन:हा सिद्ध हो गया।, संवर= शुभाशुभ भावकर्म&amp; द्रव्यकर्म के आगमन रोकने में समर्थ स्वानुभवरुप विशुद्ध परिणाम, णिज्जर= शुद्धोपयोग भावना के सामर्थसे अत्यन्त नीरस होते हुए कर्म पुद्गलोंका एकदेश खिर जाना। निर्जरा की व्याख्या में नीरस होते हुए कर्म पुद्गलोंका खिरना इस आगम वचन में कौंन२ से रहस्य छिपे हुए हैं?* *#बृहद-द्रव्यसंग्रह गाथा सूत्र २७,२८ पृष्ठ क्रं ९६ से ९८।* 2026-04-09 19:43:10
72962 40449697 हथकरघा शांतिधारा पूर्णायु 1 *शिल्पा दीदी मेरठ वालो ने 5 केश लेप व 5 केश तेल की शिशिया ऑर्डर कर दी है, यदि आप भी बालो के झड़ने से परेशान है तो शीघ्र सम्पर्क करे, विद्यासागर इंटरप्राइजेज, कोटा,9893112665*??? 2026-04-09 19:41:40
72961 40449697 हथकरघा शांतिधारा पूर्णायु 1 *शिल्पा दीदी मेरठ वालो ने 5 केश लेप व 5 केश तेल की शिशिया ऑर्डर कर दी है, यदि आप भी बालो के झड़ने से परेशान है तो शीघ्र सम्पर्क करे, विद्यासागर इंटरप्राइजेज, कोटा,9893112665*??? 2026-04-09 19:41:39
72960 40449687 अध्यात्मयोगी <a href="https://youtube.com/live/SJVKI0QY5ro?feature=share" target="_blank">https://youtube.com/live/SJVKI0QY5ro?feature=share</a> _*?54#शुद्धोपयोग भावना के सामर्थसे अत्यन्त नीरस होते हुए ही कर्म पुद्गलोंका एकदेश खिर जाना।?आगम वचन के रहस्य?-पं.अनिलजी,पुणे।*_ *#गाथा सूत्र२७?जितना आकाश अविभागी पुद्गलाणु से रोका जाता है उसे सर्व अणुओंको स्थान देनेमें योग्य प्रदेश जानो।* *#एकदेश शुद्धनिश्चयनय?(१)आगमभाषासे रत्नत्रय की एकदेश व्यक्तता (गु ४ से गु १४)=भव्यत्व पारिणामिक- -भावकी व्यक्तता/प्रगटता &amp; (२)अध्यात्म- -भाषासे-द्रव्यशक्तिरुप शुद्धपारिणामिक भावकी भावना= निर्विकल्प समाधि= शुद्धोपयोग।* *#ध्यान=भावना=नित्यानित्यार्थक्रिया? सादिसांत= विनाशीक &amp; ध्येयरुप शुद्ध पारिणामिक -भाव द्रव्यरुप होनेसे अविनाशी/अनादि-अनंत ? इस आगम टीका वचन से 'ध्यान का ध्येय अत्यन्त शुद्ध नित्यार्थक्रिया- रहित संयुक्त ही होता हैं, अन्यथा अशुद्ध' होता मैं की और आचार्य भगवान क्यौं संकेत कर रहे हैं?* *#जीव और पुद्गल के संयोगपरिणामरुप विभावपर्याय से उत्पन्न?आस्त्रव,बंध, पुण्य और पाप।* *#संवर,निर्जरा, मोक्ष, पुण्यानुबंधी पुण्य?जीव और पुद्गल के संयोगपरिणामरुप विभावपर्याय के विनाश से उत्पन्न की कालप्रत्यासत्ति त्रिकाली गुणों की पर्यायगत स्वभावपर्यायमय नित्यानित्यार्थक्रिया के साथ नियम से कैसे होती हैं?* *#गाथा सूत्र२८?आस्त्रव, बंध, संवर, निर्जरा, मोक्ष, पुण्य और पापरुप जो पदार्थ जीव और अजीव द्रव्यके विशेष हैं, उन्हे भी हम संक्षेपमें कहते हैं।? आस्त्रव=शुभाशुभ परिणाम? इस आगम वचन से शुभोपयोग आस्त्रव का कारण है, संवर का नहीं यह पुन:हा सिद्ध हो गया।, संवर= शुभाशुभ भावकर्म&amp; द्रव्यकर्म के आगमन रोकने में समर्थ स्वानुभवरुप विशुद्ध परिणाम, णिज्जर= शुद्धोपयोग भावना के सामर्थसे अत्यन्त नीरस होते हुए कर्म पुद्गलोंका एकदेश खिर जाना। निर्जरा की व्याख्या में नीरस होते हुए कर्म पुद्गलोंका खिरना इस आगम वचन में कौंन२ से रहस्य छिपे हुए हैं?* *#बृहद-द्रव्यसंग्रह गाथा सूत्र २७,२८ पृष्ठ क्रं ९६ से ९८।* 2026-04-09 19:40:36
72959 40449687 अध्यात्मयोगी <a href="https://youtube.com/live/SJVKI0QY5ro?feature=share" target="_blank">https://youtube.com/live/SJVKI0QY5ro?feature=share</a> _*?54#शुद्धोपयोग भावना के सामर्थसे अत्यन्त नीरस होते हुए ही कर्म पुद्गलोंका एकदेश खिर जाना।?आगम वचन के रहस्य?-पं.अनिलजी,पुणे।*_ *#गाथा सूत्र२७?जितना आकाश अविभागी पुद्गलाणु से रोका जाता है उसे सर्व अणुओंको स्थान देनेमें योग्य प्रदेश जानो।* *#एकदेश शुद्धनिश्चयनय?(१)आगमभाषासे रत्नत्रय की एकदेश व्यक्तता (गु ४ से गु १४)=भव्यत्व पारिणामिक- -भावकी व्यक्तता/प्रगटता &amp; (२)अध्यात्म- -भाषासे-द्रव्यशक्तिरुप शुद्धपारिणामिक भावकी भावना= निर्विकल्प समाधि= शुद्धोपयोग।* *#ध्यान=भावना=नित्यानित्यार्थक्रिया? सादिसांत= विनाशीक &amp; ध्येयरुप शुद्ध पारिणामिक -भाव द्रव्यरुप होनेसे अविनाशी/अनादि-अनंत ? इस आगम टीका वचन से 'ध्यान का ध्येय अत्यन्त शुद्ध नित्यार्थक्रिया- रहित संयुक्त ही होता हैं, अन्यथा अशुद्ध' होता मैं की और आचार्य भगवान क्यौं संकेत कर रहे हैं?* *#जीव और पुद्गल के संयोगपरिणामरुप विभावपर्याय से उत्पन्न?आस्त्रव,बंध, पुण्य और पाप।* *#संवर,निर्जरा, मोक्ष, पुण्यानुबंधी पुण्य?जीव और पुद्गल के संयोगपरिणामरुप विभावपर्याय के विनाश से उत्पन्न की कालप्रत्यासत्ति त्रिकाली गुणों की पर्यायगत स्वभावपर्यायमय नित्यानित्यार्थक्रिया के साथ नियम से कैसे होती हैं?* *#गाथा सूत्र२८?आस्त्रव, बंध, संवर, निर्जरा, मोक्ष, पुण्य और पापरुप जो पदार्थ जीव और अजीव द्रव्यके विशेष हैं, उन्हे भी हम संक्षेपमें कहते हैं।? आस्त्रव=शुभाशुभ परिणाम? इस आगम वचन से शुभोपयोग आस्त्रव का कारण है, संवर का नहीं यह पुन:हा सिद्ध हो गया।, संवर= शुभाशुभ भावकर्म&amp; द्रव्यकर्म के आगमन रोकने में समर्थ स्वानुभवरुप विशुद्ध परिणाम, णिज्जर= शुद्धोपयोग भावना के सामर्थसे अत्यन्त नीरस होते हुए कर्म पुद्गलोंका एकदेश खिर जाना। निर्जरा की व्याख्या में नीरस होते हुए कर्म पुद्गलोंका खिरना इस आगम वचन में कौंन२ से रहस्य छिपे हुए हैं?* *#बृहद-द्रव्यसंग्रह गाथा सूत्र २७,२८ पृष्ठ क्रं ९६ से ९८।* 2026-04-09 19:40:35
72957 40449675 ?विराग विशुद्ध विनिश्चल गुरुभक्त परिवार? JITO , Jalna 2026-04-09 19:38:56
72958 40449675 ?विराग विशुद्ध विनिश्चल गुरुभक्त परिवार? JITO , Jalna 2026-04-09 19:38:56
72955 40449660 Acharya PulakSagarji 07 2026-04-09 19:38:16
72956 40449660 Acharya PulakSagarji 07 2026-04-09 19:38:16