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गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ |
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*? आज का प्रेरक प्रसंग ?*
*?सोच का स्वर्ग?*
बहुत समय पहले की बात है। एक छोटे से गाँव में एक बुजुर्ग महिला रहती थीं, जिनका जीवन प्रभु भक्ति में बीता था। रोज़ सुबह-शाम वे मंदिर जातीं, भजन गातीं और सभी से प्रेमपूर्वक व्यवहार करतीं। जब मृत्यु का समय आया, तो स्वयं यमराज उनके सामने प्रकट हुए।
महिला ने पूछा — “हे यमराज! बताइए, मैं कहाँ जाऊँगी — स्वर्ग या नरक?”
यमराज मुस्कुराए, “माता, आपने जीवनभर सच्चे मन से भक्ति की है। प्रभु आपसे प्रसन्न हैं, इसलिए आपको उनके धाम ले जाया जाएगा।”
महिला प्रसन्न हुईं, पर मन में एक जिज्ञासा जागी। उन्होंने विनम्रता से कहा — “यदि अनुमति हो तो मैं स्वर्ग और नरक दोनों देखना चाहूँगी। मैंने इनके बारे में बहुत सुना है, पर देखा नहीं।”
यमराज बोले, “आपकी भक्ति के कारण यह इच्छा भी पूरी होगी।”
सबसे पहले वे उन्हें नरक ले गए। वहाँ का दृश्य भयावह था — लोग चीख रहे थे, तड़प रहे थे, पर मर नहीं पा रहे थे। बीच में एक बड़ा पात्र लटका था, जिसमें स्वादिष्ट खीर थी, पर कोई खा नहीं पा रहा था। महिला ने पूछा, “इतनी स्वादिष्ट खीर सामने है, फिर भी भूखे क्यों हो?”
एक व्यक्ति बोला, “माँ, हमारे पास लंबी चम्मचें हैं, पर बर्तन इतना ऊँचा है कि कोई स्वयं नहीं खा सकता।”
महिला के हृदय में करुणा उमड़ आई।
फिर यमराज उन्हें स्वर्ग ले गए। वहाँ सब ओर हँसी, संगीत और शांति थी। पर हैरानी की बात — वहाँ भी वही ऊँचा बर्तन था, वही खीर, वही चम्मचें। लेकिन लोग भूखे नहीं थे, सब प्रसन्न थे।
महिला ने आश्चर्य से पूछा, “यह कैसे संभव है?”
एक वृद्ध व्यक्ति मुस्कुराया, “माता, फर्क केवल सोच का है। नरक में लोग केवल अपने लिए खाना चाहते थे, पर यहाँ हम एक-दूसरे को खिलाते हैं। जो दूसरों को तृप्त करता है, वही स्वयं तृप्त होता है। यही स्वर्ग का रहस्य है।”
महिला की आँखें नम हो गईं। उन्हें समझ आ गया — प्रभु ने सबको समान परिस्थिति दी है, फर्क केवल दृष्टिकोण और सहयोग का होता है।
यमराज बोले, “माता, अब चलिए, प्रभु के धाम चलें।”
महिला शांत मुस्कान के साथ बोलीं, “अब मैं समझ गई हूँ — स्वर्ग और नरक कोई जगह नहीं, वे हमारे विचारों और कर्मों में बसते हैं।”
उन्होंने आँखें मूँदीं और प्रभु के धाम चली गईं।
*सीख:*?
*जीवन की परिस्थितियाँ सभी के लिए लगभग समान होती हैं। जो प्रेम और सहयोग से जीता है, वही स्वर्ग में है। जो स्वार्थ में उलझा रहता है, वह नरक में।*
*दूसरों की मदद ही सच्ची भक्ति है — यही सोच का स्वर्ग है*
*सदैव प्रसन्न रहिये!!*
*जो प्राप्त है-पर्याप्त है!!* |
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2026-02-12 05:08:29 |
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