| ID |
Chat ID
|
Chat Name
|
Sender
|
Phone
|
Message
|
Status
|
Date |
View |
| 70870 |
40449665 |
2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म |
|
|
??????????
*? ॥ श्री वृषभनाथाय नमः ॥ ?*
??????????
? *प्रथमानुयोग कथा*
━━━━━━━━━━━━━━━━━━
*? 128.भक्तामर ?*
. *? 40.अग्नि भी शांत हो जाती?*
???????????
<a href="https://quizzory.in/id/69d6ec8bb86cdfe2ea658934" target="_blank">https://quizzory.in/id/69d6ec8bb86cdfe2ea658934</a>
*इस लिंक के द्वारा कथा में आए प्रश्नों को 24 घंटे में हल किया जा सकता है*
???????????
*कल्पान्त काल पवनोद्धत वह्नि कल्पं,*
*दावानलं ज्वलित मुज्ज्वलमुत्फुल्लिंगम्।*
*विश्वं जिघत्सुमिव सम्मुखमापतन्तं,*
*त्वन्नाम कीर्तन जलं शमयत्यशेषम्॥ 40॥*
अन्वयार्थ - (कल्पान्त काल) प्रलयकाल की, (पवनोद्धत) पवन से उत्तेजित, (वह्निकल्पम्) अग्नि के सदृश, (ज्वलितम्) जलती हुई, (उज्ज्वलम्) धधकती हुई, (उत्स्फुल्लिंगम्) ऊपर को फुलिंगें उड़ाने वाली, (इव) मानो, (विश्वम्) समस्त संसार को, (जिघत्सु) भस्म करने की इच्छुक हो, ऐसी, (सम्मुखम्) सामने, (आपतन्तम्) आती हुई, (दावानलम्) दावाग्नि को, (त्वन्नाम कीर्तन जलम्) आपका नामोच्चारण रूप जल, (अशेषम्) पूर्ण रूप से, (शमयति) शांत कर देता है।
भावार्थ—प्रलय काल की महावायु के समान प्रचण्ड वायु से प्रज्वलित, धधकता और आकाश में तिलिंगें फेंकता हुआ, समस्त विश्व को भस्म करने के लिए उद्यत ऐसा प्रचण्ड दावानल भी आपके नाम रूपी जल के प्रभाव से क्षण भर में शांत हो जाता है अर्थात आपका भक्त अग्नि भय से विमुक्त रहता है।
*लक्ष्मीधर सेठ की कथा*
से भयानक दावानल (अग्नि) भी शांत हो जाता है। इस कार्य से सेठजी एक महान दानी के रूप में प्रसिद्ध हो गए।
लक्ष्मीधर नामक सेठ, जो कि पौदनपुर के निवासी थे और उनके पास असीम धन-दौलत के कारण नगर के लोग उन्हें नगर सेठ के नाम से पुकारते थे। जैसा उनका नाम था वैसा ही उनका गुण था अर्थात वे अपार लक्ष्मी के स्वामी थे। सेठ जी का व्यापार नगर से बाहर भी फैला था। एक बार वे व्यापार के निमित्त सिंहल द्वीप को रवाना हुए और वहाँ पर जाकर उन्होंने बहुत सा धन कमाया। धन-दौलत से भरे हुए बड़े-बड़े जहाजों के साथ वे अपने देश वापस लौटे परंतु कर्म को किसने देखा, कब किसके जीवन में कौन सी विपत्ति आकर सामने खड़ी हो जाए। ऐसा ही हुआ सेठ जी के धन-दौलत से लदे जहाजों में दुर्भाग्यवश आग लग जाती है और वह आग इतनी बढ़ चुकी थी कि लगता था अब तो प्राणों की रक्षा भी संभव नहीं है।
यद्यपि उस समय सेठ जी अपने शयन कक्ष में रात्रि में शयन कर रहे थे और रात्रि में यह अग्नि कहाँ से व कैसे प्रारंभ हुई, किसी को कुछ भी ज्ञात नहीं था। सभी निरंतर एक ही प्रयास में थे कि जैसे तैसे अग्नि को बुझाया जाए। बाहर के कोलाहल से सेठ जी की नींद खुल गई। कुछ लोग आवाज कर रहे थे “भागो-भागो-भागो” तो कोई कह रहा था “बचाओ-बचाओ-बचाओ”, तो कहीं से आवाज आ रही थी “अग्नि बुझाओ, पानी
‘लाओ’ सेठ जी घबरा जाते हैं परंतु वे जैन धर्म के अनन्य उपासक थे। वे मूलाचार में आचार्य कुंदकुंद देव के कहे हुए वाक्यों को याद करते हैं कि—
*‘वीरेण वि मरिदव्वं णिव्वीरेण वि अवस्स मरिदव्वं।*
*जदि दोहिं विहि मरिदव्वं वरं हि वीरत्तणेण मरिदव्वं॥’*
एक वीर पुरुष को भी मरना पड़ता है और कायर पुरुष के लिए भी मरना पड़ता है। संसार में जिसने जन्म लिया है उसे अवश्य ही मरना पड़ता है। यदि यह सत्य है तो क्यों न हम वीरता के साथ मरण करें। ऐसा साधक उपसर्ग के समय घबराता नहीं है, अपितु समता रखता है।
बंधुओ! सेठ लक्ष्मीधर इस चिंतन में डूबते हैं और वीरता के साथ, वीर मरण का संकल्प ले लेते हैं। वीर मरण का अर्थ इतना ही नहीं है कि संग्राम में जो मरण हो वह वीर मरण है, अपितु हमारे आचार्य भगवंत ने कहा है वीर मरण यानी समाधि मरण। वीर मरण यानी धर्म के साथ मरण, वीर मरण यानी संयम के साथ मरण, वीर मरण यानी भगवान के नाम के साथ मरण। धर्मात्मा जिसके लिए निरंतर प्रयत्नशील रहता है वह भगवान से सदा यही प्रार्थना करते हैं कि दिन रात मेरे स्वामी में भावना ये भावड़े, देहांत के समय में तुमको न भूल जाऊं। अर्थात हे भगवान! अंत समय में सब कुछ भूल जाऊं परंतु आपका नाम कंठगत प्राण होने तक मुझे स्मरण बना रहे। सत्य है, जिसके जीवन में परमात्मा के प्रति सच्ची श्रद्धा-भक्ति होती है वह कभी घबराता नहीं है। उसके पास विवेक होता है और वह अपने विवेक से कार्य करता है।
बंधुओ! सेठजी भी परमात्मा का स्मरण करते हैं। भक्तामर के चालीसवें काव्य का निरंतर पाठ करने लगते हैं और भगवान ऋषभदेव की भक्ति में तल्लीन हो जाते हैं। उनकी भक्ति के प्रभाव से काव्य की देवी प्रकट होती हैं और जैसे ही देवी प्रकट होती है, वह सेठ की ओर निहारती हैं। बिना आशा के, बिना कहे ही वह देवी सेठ के लिए विश्वास दिलाती है कि सेठ जी घबराइए नहीं, आपका कुछ भी नहीं बिगड़ेगा और क्षण भर में अग्नि शांत हो जाती है, अग्नि बुझ जाती है।
पूज्य आचार्य महाराज कहते हैं कि इस काव्य की ऐसी महिमा है जो मात्र बाहर की ही अग्नि नहीं अपितु अंतरंग में धधकने वाली विभिन्न अग्नियों को भी शांत कर देता है। कभी क्रोधाग्नि, कभी कामाग्नि तो कभी मोहाग्नि अपने विविध रूपों को धारण कर भड़क उठती है और आत्मा के संपूर्ण गुणों को नष्ट कर देती है। प्रायः हम बाहर की अग्नि को तो बुझाने का प्रयत्न करते हैं, बाहर की अग्नि को देखकर घबरा जाते हैं किंतु प्राणी ने कभी अंदर की जलती हुई अग्नियों को नहीं देखा। उसके विषय में कभी नहीं सोचा, कभी नहीं विचार किया। बाहर की अग्नि तो मात्र जड़ पदार्थों को जलाती है, फिर बाहर के पदार्थ जल भी जाएं तो सरकार सहायता दे देती है, आपकी हानि की पूर्ति करा सकती है परंतु अंतरंग अग्नि आत्मिक गुणों को नष्ट कर देती है जिसकी क्षतिपूर्ति कोई नहीं कर सकता। दीपायन मुनि के अंतरंग में क्रोधाग्नि भड़की थी, जिसने सारी साधना को जलाकर राख कर दिया। क्रोधाग्नि ऐसी अग्नि है, जो दूसरों को तो जलाती है किंतु क्रोध करने वाले को भी नष्ट कर देती है। फलस्वरूप क्रोधाग्नि ने दीपायन मुनि को भी नष्ट कर दिया।शरीर को ही नहीं अपितु आत्मिक गुणों को भी नष्ट कर देती हैं। दूसरी अग्नि ‘कामाग्नि’ होती है। जब व्यक्ति के अंदर वासना भड़कती है तो वह सब कुछ भूल जाता है। इसके विषय में कहा गया है—
*“विषयासक्त चित्तानां, गुणः को वा न नश्यति।*
*न वैदुतष्यं न मानुष्यं,नाभिजात्यं न सत्यवाक्॥”*
आचार्य महाराज कह रहे हैं, विषय-वासनारूपी अग्नि मनुष्यता के लिए नष्ट ही नहीं करती, किन्तु सरलता, विनय और भी जो मानवीय गुण होते हैं उन सबको समाप्त कर देती है।
एक होती है ‘मोहिनी’। मोह के वशीभूत हुआ मनुष्य पागल की तरह होता है, जिसे सत्य-असत्य का कुछ भी ज्ञान नहीं होता। मोहिनी जीव को आत्म स्वरूप से वंचित कर देती है। ये सम्पूर्ण आंतरिक अग्नियां आत्मा के गुणों को नष्ट करने वाली हैं। अतः इन अग्नियों को नष्ट करने के लिए है भगवान! आपके गुणचिंतन रूप जल ही समर्थ है। अतः हम सभी को इन बाह्य व आंतरिक अग्नियों को शांत करने हेतु तथा आत्मिक गुणों को प्राप्त करने हेतु प्रभु परमात्मा की सच्चे हृदय से भक्ति करनी चाहिए क्योंकि भक्ति ही मुक्ति का सोपान है।
*बोलिए – ‘भगवान महावीर स्वामी की जय’*
*✍? संकलन*
*?️ पं. मुकेश शास्त्री*
*? सुसनेर*
*? 9425935221*
*? 9.अप्रैल2026*
?????????? |
|
2026-04-09 07:19:19 |
|
| 70869 |
40449665 |
2.0 Jain Dharam ? जैन धर्म |
|
|
??????????
*? ॥ श्री वृषभनाथाय नमः ॥ ?*
??????????
? *प्रथमानुयोग कथा*
━━━━━━━━━━━━━━━━━━
*? 128.भक्तामर ?*
. *? 40.अग्नि भी शांत हो जाती?*
???????????
<a href="https://quizzory.in/id/69d6ec8bb86cdfe2ea658934" target="_blank">https://quizzory.in/id/69d6ec8bb86cdfe2ea658934</a>
*इस लिंक के द्वारा कथा में आए प्रश्नों को 24 घंटे में हल किया जा सकता है*
???????????
*कल्पान्त काल पवनोद्धत वह्नि कल्पं,*
*दावानलं ज्वलित मुज्ज्वलमुत्फुल्लिंगम्।*
*विश्वं जिघत्सुमिव सम्मुखमापतन्तं,*
*त्वन्नाम कीर्तन जलं शमयत्यशेषम्॥ 40॥*
अन्वयार्थ - (कल्पान्त काल) प्रलयकाल की, (पवनोद्धत) पवन से उत्तेजित, (वह्निकल्पम्) अग्नि के सदृश, (ज्वलितम्) जलती हुई, (उज्ज्वलम्) धधकती हुई, (उत्स्फुल्लिंगम्) ऊपर को फुलिंगें उड़ाने वाली, (इव) मानो, (विश्वम्) समस्त संसार को, (जिघत्सु) भस्म करने की इच्छुक हो, ऐसी, (सम्मुखम्) सामने, (आपतन्तम्) आती हुई, (दावानलम्) दावाग्नि को, (त्वन्नाम कीर्तन जलम्) आपका नामोच्चारण रूप जल, (अशेषम्) पूर्ण रूप से, (शमयति) शांत कर देता है।
भावार्थ—प्रलय काल की महावायु के समान प्रचण्ड वायु से प्रज्वलित, धधकता और आकाश में तिलिंगें फेंकता हुआ, समस्त विश्व को भस्म करने के लिए उद्यत ऐसा प्रचण्ड दावानल भी आपके नाम रूपी जल के प्रभाव से क्षण भर में शांत हो जाता है अर्थात आपका भक्त अग्नि भय से विमुक्त रहता है।
*लक्ष्मीधर सेठ की कथा*
से भयानक दावानल (अग्नि) भी शांत हो जाता है। इस कार्य से सेठजी एक महान दानी के रूप में प्रसिद्ध हो गए।
लक्ष्मीधर नामक सेठ, जो कि पौदनपुर के निवासी थे और उनके पास असीम धन-दौलत के कारण नगर के लोग उन्हें नगर सेठ के नाम से पुकारते थे। जैसा उनका नाम था वैसा ही उनका गुण था अर्थात वे अपार लक्ष्मी के स्वामी थे। सेठ जी का व्यापार नगर से बाहर भी फैला था। एक बार वे व्यापार के निमित्त सिंहल द्वीप को रवाना हुए और वहाँ पर जाकर उन्होंने बहुत सा धन कमाया। धन-दौलत से भरे हुए बड़े-बड़े जहाजों के साथ वे अपने देश वापस लौटे परंतु कर्म को किसने देखा, कब किसके जीवन में कौन सी विपत्ति आकर सामने खड़ी हो जाए। ऐसा ही हुआ सेठ जी के धन-दौलत से लदे जहाजों में दुर्भाग्यवश आग लग जाती है और वह आग इतनी बढ़ चुकी थी कि लगता था अब तो प्राणों की रक्षा भी संभव नहीं है।
यद्यपि उस समय सेठ जी अपने शयन कक्ष में रात्रि में शयन कर रहे थे और रात्रि में यह अग्नि कहाँ से व कैसे प्रारंभ हुई, किसी को कुछ भी ज्ञात नहीं था। सभी निरंतर एक ही प्रयास में थे कि जैसे तैसे अग्नि को बुझाया जाए। बाहर के कोलाहल से सेठ जी की नींद खुल गई। कुछ लोग आवाज कर रहे थे “भागो-भागो-भागो” तो कोई कह रहा था “बचाओ-बचाओ-बचाओ”, तो कहीं से आवाज आ रही थी “अग्नि बुझाओ, पानी
‘लाओ’ सेठ जी घबरा जाते हैं परंतु वे जैन धर्म के अनन्य उपासक थे। वे मूलाचार में आचार्य कुंदकुंद देव के कहे हुए वाक्यों को याद करते हैं कि—
*‘वीरेण वि मरिदव्वं णिव्वीरेण वि अवस्स मरिदव्वं।*
*जदि दोहिं विहि मरिदव्वं वरं हि वीरत्तणेण मरिदव्वं॥’*
एक वीर पुरुष को भी मरना पड़ता है और कायर पुरुष के लिए भी मरना पड़ता है। संसार में जिसने जन्म लिया है उसे अवश्य ही मरना पड़ता है। यदि यह सत्य है तो क्यों न हम वीरता के साथ मरण करें। ऐसा साधक उपसर्ग के समय घबराता नहीं है, अपितु समता रखता है।
बंधुओ! सेठ लक्ष्मीधर इस चिंतन में डूबते हैं और वीरता के साथ, वीर मरण का संकल्प ले लेते हैं। वीर मरण का अर्थ इतना ही नहीं है कि संग्राम में जो मरण हो वह वीर मरण है, अपितु हमारे आचार्य भगवंत ने कहा है वीर मरण यानी समाधि मरण। वीर मरण यानी धर्म के साथ मरण, वीर मरण यानी संयम के साथ मरण, वीर मरण यानी भगवान के नाम के साथ मरण। धर्मात्मा जिसके लिए निरंतर प्रयत्नशील रहता है वह भगवान से सदा यही प्रार्थना करते हैं कि दिन रात मेरे स्वामी में भावना ये भावड़े, देहांत के समय में तुमको न भूल जाऊं। अर्थात हे भगवान! अंत समय में सब कुछ भूल जाऊं परंतु आपका नाम कंठगत प्राण होने तक मुझे स्मरण बना रहे। सत्य है, जिसके जीवन में परमात्मा के प्रति सच्ची श्रद्धा-भक्ति होती है वह कभी घबराता नहीं है। उसके पास विवेक होता है और वह अपने विवेक से कार्य करता है।
बंधुओ! सेठजी भी परमात्मा का स्मरण करते हैं। भक्तामर के चालीसवें काव्य का निरंतर पाठ करने लगते हैं और भगवान ऋषभदेव की भक्ति में तल्लीन हो जाते हैं। उनकी भक्ति के प्रभाव से काव्य की देवी प्रकट होती हैं और जैसे ही देवी प्रकट होती है, वह सेठ की ओर निहारती हैं। बिना आशा के, बिना कहे ही वह देवी सेठ के लिए विश्वास दिलाती है कि सेठ जी घबराइए नहीं, आपका कुछ भी नहीं बिगड़ेगा और क्षण भर में अग्नि शांत हो जाती है, अग्नि बुझ जाती है।
पूज्य आचार्य महाराज कहते हैं कि इस काव्य की ऐसी महिमा है जो मात्र बाहर की ही अग्नि नहीं अपितु अंतरंग में धधकने वाली विभिन्न अग्नियों को भी शांत कर देता है। कभी क्रोधाग्नि, कभी कामाग्नि तो कभी मोहाग्नि अपने विविध रूपों को धारण कर भड़क उठती है और आत्मा के संपूर्ण गुणों को नष्ट कर देती है। प्रायः हम बाहर की अग्नि को तो बुझाने का प्रयत्न करते हैं, बाहर की अग्नि को देखकर घबरा जाते हैं किंतु प्राणी ने कभी अंदर की जलती हुई अग्नियों को नहीं देखा। उसके विषय में कभी नहीं सोचा, कभी नहीं विचार किया। बाहर की अग्नि तो मात्र जड़ पदार्थों को जलाती है, फिर बाहर के पदार्थ जल भी जाएं तो सरकार सहायता दे देती है, आपकी हानि की पूर्ति करा सकती है परंतु अंतरंग अग्नि आत्मिक गुणों को नष्ट कर देती है जिसकी क्षतिपूर्ति कोई नहीं कर सकता। दीपायन मुनि के अंतरंग में क्रोधाग्नि भड़की थी, जिसने सारी साधना को जलाकर राख कर दिया। क्रोधाग्नि ऐसी अग्नि है, जो दूसरों को तो जलाती है किंतु क्रोध करने वाले को भी नष्ट कर देती है। फलस्वरूप क्रोधाग्नि ने दीपायन मुनि को भी नष्ट कर दिया।शरीर को ही नहीं अपितु आत्मिक गुणों को भी नष्ट कर देती हैं। दूसरी अग्नि ‘कामाग्नि’ होती है। जब व्यक्ति के अंदर वासना भड़कती है तो वह सब कुछ भूल जाता है। इसके विषय में कहा गया है—
*“विषयासक्त चित्तानां, गुणः को वा न नश्यति।*
*न वैदुतष्यं न मानुष्यं,नाभिजात्यं न सत्यवाक्॥”*
आचार्य महाराज कह रहे हैं, विषय-वासनारूपी अग्नि मनुष्यता के लिए नष्ट ही नहीं करती, किन्तु सरलता, विनय और भी जो मानवीय गुण होते हैं उन सबको समाप्त कर देती है।
एक होती है ‘मोहिनी’। मोह के वशीभूत हुआ मनुष्य पागल की तरह होता है, जिसे सत्य-असत्य का कुछ भी ज्ञान नहीं होता। मोहिनी जीव को आत्म स्वरूप से वंचित कर देती है। ये सम्पूर्ण आंतरिक अग्नियां आत्मा के गुणों को नष्ट करने वाली हैं। अतः इन अग्नियों को नष्ट करने के लिए है भगवान! आपके गुणचिंतन रूप जल ही समर्थ है। अतः हम सभी को इन बाह्य व आंतरिक अग्नियों को शांत करने हेतु तथा आत्मिक गुणों को प्राप्त करने हेतु प्रभु परमात्मा की सच्चे हृदय से भक्ति करनी चाहिए क्योंकि भक्ति ही मुक्ति का सोपान है।
*बोलिए – ‘भगवान महावीर स्वामी की जय’*
*✍? संकलन*
*?️ पं. मुकेश शास्त्री*
*? सुसनेर*
*? 9425935221*
*? 9.अप्रैल2026*
?????????? |
|
2026-04-09 07:19:18 |
|
| 70867 |
40449660 |
Acharya PulakSagarji 07 |
|
|
|
|
2026-04-09 07:19:16 |
|
| 70868 |
40449660 |
Acharya PulakSagarji 07 |
|
|
|
|
2026-04-09 07:19:16 |
|
| 70866 |
40449660 |
Acharya PulakSagarji 07 |
|
|
|
|
2026-04-09 07:19:15 |
|
| 70865 |
40449660 |
Acharya PulakSagarji 07 |
|
|
|
|
2026-04-09 07:19:14 |
|
| 70863 |
40449718 |
विनय गुरु ? |
|
|
??नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु महाराज जी ???????????????????????????????????????????????? |
|
2026-04-09 07:19:04 |
|
| 70864 |
40449718 |
विनय गुरु ? |
|
|
??नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु महाराज जी ???????????????????????????????????????????????? |
|
2026-04-09 07:19:04 |
|
| 70861 |
40449729 |
माँ विशुद्ध भक्त परिवार?7 |
|
|
प्रभु थाम लो अब में यही चाहूं |
|
2026-04-09 07:18:53 |
|
| 70862 |
40449729 |
माँ विशुद्ध भक्त परिवार?7 |
|
|
प्रभु थाम लो अब में यही चाहूं |
|
2026-04-09 07:18:53 |
|