WhatsApp Messages Dashboard

Total Records in Table: 18913

Records Matching Filters: 18913

From: To: Global Search:

Messages

ID Chat ID
Chat Name
Sender
Phone
Message
Status
Date View
70500 40449703 गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ *णमोकार महामंत्र का महात्म्य* _जैन दर्शन में णमोकार महामंत्र जिसे नमस्कार मंत्र भी कहा जाता है, यह एक पवित्र मंत्र है। यह मंत्र जैन धर्म के मूल सिद्धांतों का प्रतीक है और इसे जैन परम्परा का सबसे प्रमुख एवं सर्व व्यापक मंत्र माना जाता है। इसका उच्चारण करने से साधक को शांति और आत्मिक बल की प्राप्ति होती है। इस मंत्र में किसकी स्तुति की गई है, इस मंत्र की विशेषता और महत्व क्या है ? इस विषय को समझते है।_ *णमोकार महामंत्र-* *णमो अरिहंताणं,* *णमो सिद्धाणं* *णमो आइरियाणं* *णमो उवज्झायाणं* *णमो लोएसव्व साहूणं।।* _अर्थात् नमस्कार हो लोक के सभी अरिहंतो को, नमस्कार हो लोक के सभी सिद्धों को, नमस्कार हो लोक के सभी आचार्यों को, नमस्कार हो लोक के सभी उपाध्यायों को और नमस्कार हो लोक के सभी साधुओं को।_ *णमोकार महामंत्र की विशेषता -* *1- रचना -* _णमोकार महामंत्र की रचना किसी ने नहीं की है यह स्वयमेव रचा हुआ है, शाश्वत है, अनादिकाल से प्रवर्तमान अनादि अनिधन मंत्र है। इस मंत्र को ईसा की पहली शताब्दी में सर्वप्रथम आचार्य श्री पुष्पदंत मुनि और आचार्य श्री भूतबली जी मुनि ने षट् खण्डागम ग्रंथ में मंगलाचरण के रूप में प्राकृत भाषा में आर्या छन्द में लिपिबद्ध किया था।_ *2- विषय -* _इस मंत्र में पञ्च परमेष्ठियों को नमस्कार किया गया है। जो परम पद में स्थित होते है तथा जो आत्मा के पदों और गुणों में सबसे बड़े होते है तथा राजा, महाराजा व इन्द्र भी जिनको सिर झुकाते हैं, उन्हें परमेष्ठी कहते है। परमेष्ठी पांच होते है - अरिहंत परमेष्ठी, सिद्ध परमेष्ठी, आचार्य परमेष्ठी, उपाध्याय परमेष्ठी और साधु परमेष्ठी।_ *3- बनावट -* _इस मंत्र में 5 पद, 35 अक्षर और 58 मात्राएं है। णमो अरिहंताणं में 7 अक्षर 11 मात्राएं, णमो सिद्धाणं में 5 अक्षर 9 मात्राएं, णमो आइरियाणं में 7 अक्षर 11 मात्राएं, णमो उवज्झायाणं में 7 अक्षर 12 मात्राएं, णमो लोए सव्व साहूणं में 9 अक्षर 15 मात्राएं है।_ *4- अनेक नाम -* _णमोकार मंत्र को नमस्कार मंत्र, पञ्च परमेष्ठी मंत्र, पञ्च नमस्कार मंत्र,अनादिमूलमंत्र,अनादि अनिधन मंत्र, अपराजित मंत्र, महामंत्र, मूलमंत्र,मंत्रराज,सर्वकालिक मंत्र,मोक्ष प्रदायक मंत्र,पंच मंगल मंत्र, पैंतीस अक्षर वाला मंत्र आदि नामों से भी जाना जाता है।_ *5- उच्चारण -* _शुद्ध उच्चारण करते हुए एक बार णमोकार मंत्र पढ़ते हुए तीन श्वासोच्छवास लगते है।_ *6- साधन -* _इस णमोकार मंत्र से चौरासी लाख मंत्रों की उत्पत्ति हुई है।_ *7- फल -* _यह णमोकार मंत्र वाचक जाप से मानस जाप में हजार गुणा अधिक पुण्य संचय कराता है। धवला ग्रंथ में आया है कि चलते-फिरते, उठते-बैठते णमोकार मंत्र को भाव सहित पढ़ने से अनन्त गुणी कर्मों की निर्जरा होती है।_ *8- सार्वभौमिकता -* _णमोकार मंत्र में किसी विशेष व्यक्ति,जाति या वर्ग का नाम नहीं आता है। यह सभी अरिहंतों, सिद्धों, आचार्यों, उपाध्यायों और साधुओं का समर्पण पूर्वक सम्मान करता है।_ *9- आत्मिक शुद्धि -* _इस मंत्र का जाप साधक को मन और आत्मा की शुद्धि की दिशा में प्रेरित करता है। यह भावनाओं और विचारों को संयमित करने का साधन है। यह मंत्र जैन-धर्म का प्रमुख मंत्र होने के बावजूद सम्पूर्ण मानवता के कल्याण का संदेश देता है और सभी को आत्मिक शांति और सुख प्रदान करने की दिशा में अग्रसर करता है।_ *10- पवित्रता -* _यह मंत्र अत्यंत पवित्र है और इसे जैन साधक दिन-रात जपते हैं। इसके द्वारा आत्मा के चारित्रिक दोष दूर होते है और संयम, त्याग और साधना में वृत्ति बढ़ती है।_ *11- अहिंसा का संदेश -* _णमोकार मंत्र अहिंसा, करूणा और सर्वकल्याण का प्रतीक है। इसमें किसी जीव या वस्तु के प्रति हिंसा का कोई भाव नहीं है, अपितु परमेष्ठी के गुणों का गुणानुवाद ही है।_ *12- कर्म निर्जरा -* _यह मंत्र जैन साधकों को कर्मों की निर्जरा (कर्मों का नाश) की दिशा में प्रेरित करता है। इसका नियमित उच्चारण जीवन में धर्म का विकास करता है और आत्मा को शुद्ध करने में सहायक होता है।_ *13- समता भाव -* _इस मंत्र में किसी एक विशेष गुरु या भगवान का नाम नहीं लिया गया है। यह सभी को समान भाव से नमस्कार करता है, जिससे समता गुण विकसित होता है।_ *णमोकार मंत्र के जाप के समय रखने योग्य शुद्धियां -* _णमोकार मंत्र का जाप करने के लिए सर्वप्रथम आठ प्रकार की शुद्धियों का होना आवश्यक है।_ *1- द्रव्य शुद्धि -* _पंचेन्द्रिय तथा मन को वश कर कषाय और परिग्रह का शक्ति के अनुसार त्याग कर कोमल और दयालु चित्त हो जाप करना। यहां द्रव्य शुद्धि का अभिप्राय पात्र की अन्तरंग शुद्धि से है। जाप करने वाले को यथाशक्ति अपने विकारों को हटाकर ही जाप करना चाहिए। अन्तरंग से काम, क्रोध,लोभ,मोह,मान, माया आदि विकारों को हटाना आवश्यक है।_ *2- क्षेत्र शुद्धि -* _निराकुल स्थान, जहां हल्ला-गुल्ला न हो तथा डांह, मच्छर आदि बाधक जन्तु न हो, चित्त में क्षोभ उत्पन्न करने वाले उपद्रव एवं शीत-उष्ण की बाधा न हो,ऐसा एकान्त निर्जन स्थान जाप करने के लिए उत्तम है। घर के किसी एकांत प्रदेश में, जहां अन्य किसी प्रकार की बाधा न हो और पूर्ण शांति रह सके,उस स्थान पर भी जाप किया जा सकता है।_ *3- समय शुद्धि -* _प्रातः, मध्याह्न और सांयकाल के समय कम से कम अड़तालीस मिनट तक लगातार इस महामंत्र का जाप करना चाहिए। जाप करते समय निश्चित रहना एवं निराकुल होना परम आवश्यक है।_ *4- आसन शुद्धि -* _काष्ठ,शिला, भूमि,चटाई या शीतल पट्टी पर पूर्व दिशा या उत्तर दिशा की ओर मुख करके पद्मासन, खड्गासन या अर्ध पद्मासन होकर क्षेत्र तथा काल का प्रमाण करके मौन पूर्वक इस मंत्र का जाप करना चाहिए।_ *5- विनय शुद्धि -* _जिस आसन पर बैठकर जाप करना हो उस आसन को सावधानी पूर्वक ईर्यापथ शुद्धि के साथ साफ करना चाहिए तथा जाप करने के लिए नम्रता पूर्वक भीतर का अनुराग भी रहना आवश्यक है। जब तक जाप करने के लिए भीतर का उत्साह नहीं होगा,तब तक सच्चे मन से जाप नहीं किया जा सकता।_ *6- मन: शुद्धि -* _विचारों की गन्दगी को त्यागकर मन को एकाग्र करना, चंचल मन इधर-उधर न भटकने पाये इसकी चेष्टा करना,मन को पूर्णतया पवित्र बनाने का प्रयास करना ही इस शुद्धि में अभिप्रेत है।_ *7- वचन शुद्धि -* _धीरे-धीरे साम्यभाव पूर्वक इस मंत्र का शुद्ध जाप करना अर्थात् उच्चारण करने में अशुद्धि न होने पाये तथा उच्चारण मन ही मन में होना चाहिए।_ *8- काय शुद्धि -* _शौचादि शंकाओं से निवृत्त होकर यत्नाचार पूर्वक शरीर शुद्ध करके हलन-चलन क्रिया से रहित जाप करना चाहिए। जाप के समय शारीरिक शुद्धि का भी ध्यान रखना चाहिए।_ _इस महामंत्र का जाप यदि खड़े होकर करना हो तो तीन-तीन श्वासोच्छवासों में एक बार पढ़ना चाहिए। 108 बार के जाप में कुल 324 श्वासोच्छवास लेना चाहिए।_ *णमोकार मंत्र के जाप करने की विधि -* _जाप तीन प्रकार से किया जाता है - *वाचक* जाप, *उपांशु* जाप और *मानस* जाप।_ *वाचक* _जाप में शब्दों का उच्चारण किया जाता है अर्थात् मन्त्र को मुंह से बोल-बोल कर जाप किया जाता है।_ *उपांशु जाप* _में मंत्र को भीतर से शब्दोच्चारण की क्रिया होती है,जीभ अंदर चलती रहती है,कण्ठ स्थान पर मंत्र के शब्द गूंजते रहते है किन्तु मुख से उच्चारण नहीं किया जाता है।_ *मानस जाप* _में बाहरी और भीतरी शब्दोच्चारण का प्रयास रुक जाता है, सिर्फ मन में णमोकार मंत्र का चिन्तन होता रहता है। यही क्रिया ध्यान का रूप धारण करती है।_ *यशस्तिलक चम्पु* _में कहा गया है -_ *वचसा वा मनसा वा कार्यो जाप्य: सव्याहितस्रान्ते।* *शतगुणमाद्ये पुण्ये सहस्रसंख्यं द्वितीये तु।।* _वाचक जाप से उपांशु जाप में शतगुणा पुण्य और उपांशु जाप की अपेक्षा मानस जाप में सहस्रगुणा पुण्य होता है। मानस जाप ही ध्यान का रूप है, यह अन्तर्जल्प रहित मौन रूप होता है।_ *णमोकार महामंत्र का महात्म्य -* *ऐसो पंच णमोयारो,सव्व पावप्पणासणो।* *मंगलाणं च सव्वेसिं,पढमं होई मंगलं।।* _यह पंच नमस्कार मंत्र सब पापों को नष्ट करने वाला है और सब मंगलों में पहला मंगल है। इसलिए प्रत्येक शुभ कार्य करने के पहले यह मंत्र जरुर बोलना चाहिए।_ _यह मंत्र प्रत्येक मनुष्य पढ़ सकते है। संसार में जितने भी मन्त्रों का प्रचलन है उनमें से यह णमोकार महामंत्र सबसे महान् है। इस मंत्र को प्रतिदिन 108 बार मन लगाकर जाप करने से सभी रोग,संकट, आपत्तियां, दुःख आदि दूर हो जाते है। समस्त सुखों की प्राप्ति होती है और अंत में मोक्ष प्राप्त होता है। अतः प्रतिदिन इस मंत्र को 108 बार अवश्य जपना चाहिए।_ *दु:खे सुखे भयस्थाने,पथि दुर्गे रणेऽपि वा।* *श्री पंचगुरुमंत्रस्य,पाठ: कार्य: पदे पदे।।* _अर्थात् - दुःख में, सुख में,डर के स्थान में, मार्ग में, भयानक स्थान में, युद्ध के मैदान में, कदम-कदम पर णमोकार मंत्र का जाप करना चाहिए।_ _यह महामंत्र तीनों लोकों में अनुपम है,इस मंत्र के समान चमत्कारी और प्रभावशाली अन्य कई मंत्र नहीं है, यह समस्त पापों का अरि है। इस मंत्र का जाप करने से किसी भी प्रकार का पाप नष्ट हुए बिना नहीं रहता है,जिस प्रकार अग्नि का एक कण घांस-फूस के बड़े-बड़े ढेरों को नष्ट कर देता है,उसी प्रकार यह मंत्र सभी तरह के पापों को नष्ट करने वाला होने के कारण पापारि है। यह मंत्र संसार का उच्छेदक, व्यक्ति के भाव संसार राग -द्वेष आदि और द्रव्य संसार ज्ञानावरण आदि कर्मों का विनाशक है,तिक्ष्ण विषों का नाश करने वाला है अर्थात् इस महामंत्र के प्रभाव से सभी प्रकार की विष-बाधाएं दूर हो जाती है। इस मंत्र का भाव सहित उच्चारण करने से कर्मों की निर्जरा होती है तथा योग-निरोध पूर्वक इसका स्मरण करने से कर्मों का विनाश होता है। यह मंत्र सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाला है,भाव सहित और विधि सहित इस मंत्र का अनुष्ठान करने से सभी तरह की लौकिक-अलौकिक सिद्धियां प्राप्त हो जाती है,साधक जिस वस्तु की कामना करता है,वह उसे प्राप्त हो जाती है। दुर्लभ और असम्भव कार्य भी इस महामंत्र की साधना से पूर्ण हो जाते है, यह मंत्र मोक्ष-सुख को उत्पन्न करने वाला है। यह मंत्र केवलज्ञान मंत्र कहलाता है अर्थात् इसके जाप से केवलज्ञान की प्राप्ति होती है तथा यही मंत्र निर्वाण सुख को देने वाला भी है।_ _पवित्र या अपवित्र अथवा सोते, जागते,चलते, फिरते किसी भी अवस्था में इस णमोकार मंत्र का स्मरण करने से आत्मा सर्वपापों से मुक्त हो जाता है,शरीर और मन पवित्र हो जाते है। यह मंत्र आत्मा को पवित्र करने वाला है। यह णमोकार मंत्र अपराजित है, अन्य किसी मंत्र द्वारा इसकी शक्ति प्रतिहत अवरूद्ध नहीं की जा सकती है, इसमें अद्भुत सामर्थ्य निहित है। समस्त विध्नों को क्षणभर में ही दूर किया जा सकता है। जिस प्रकार हलाहल विष तत्काल अपना फल देता है और उसका फल अव्यर्थ होता है,उसी प्रकार णमोकार मंत्र भी तत्काल शुभ पुण्य का आस्रव करता है तथा अशुभोदय के प्रभाव को क्षीण करता है। यह सम्यक्त्व की वृद्धि में सहायक होता है। मनुष्य जीवन-भर पापास्रव करने पर भी अन्तिम समय में इस महामंत्र के स्मरण के प्रभाव से स्वर्गादि सुखों को प्राप्त कर लेता है। यह णमोकार मंत्र सभी प्रकार की आकुलताओं को दूर करने वाला है।_ _मरणोन्मुख कुत्ते को जीवन्धर स्वामी ने करुणावश णमोकार मंत्र सुनाया था,इस मंत्र के प्रभाव से वह पापाचारी श्वान देवता के रूप में उत्पन्न हुआ। अतः सिद्ध है कि यह मंत्र आत्म विशुद्धि का बहुत बड़ा कारण है। णमोकार मंत्र के एक अक्षर का भी भाव सहित स्मरण करने से सात सागर तक भोगा जाने वाला पाप नष्ट हो जाता है, एक पद भाव सहित स्मरण करने से पचास सागर तक भोगे जाने वाले पाप का नाश होता है और समग्र मंत्र का भक्ति भाव सहित विधि पूर्वक स्मरण करने से पांच सौ सागर तक भोगे जाने वाले पाप का नाश हो जाता है। भाव सहित स्मरण किया गया यह णमोकार मंत्र असंख्य दुःखों को क्षय करने वाला तथा इह लौकिक और पारलौकिक समस्त सुखों को देने वाला है। इस पंचमकाल में कल्पवृक्ष के समान सभी मनोरथों को पूर्ण करने वाला यह मंत्र ही है, अतः संसारी प्राणियों को इसका जाप अवश्य करना चाहिए। जिस अज्ञान,पाप और संक्लेश के अन्धकार को सूर्य, चन्द्र और दीपक दूर नहीं कर सकते हैं,उस घने अन्धकार को यह मंत्र नष्ट कर देता है।_ ??????? 2026-04-09 04:55:00
70499 40449703 गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ *णमोकार महामंत्र का महात्म्य* _जैन दर्शन में णमोकार महामंत्र जिसे नमस्कार मंत्र भी कहा जाता है, यह एक पवित्र मंत्र है। यह मंत्र जैन धर्म के मूल सिद्धांतों का प्रतीक है और इसे जैन परम्परा का सबसे प्रमुख एवं सर्व व्यापक मंत्र माना जाता है। इसका उच्चारण करने से साधक को शांति और आत्मिक बल की प्राप्ति होती है। इस मंत्र में किसकी स्तुति की गई है, इस मंत्र की विशेषता और महत्व क्या है ? इस विषय को समझते है।_ *णमोकार महामंत्र-* *णमो अरिहंताणं,* *णमो सिद्धाणं* *णमो आइरियाणं* *णमो उवज्झायाणं* *णमो लोएसव्व साहूणं।।* _अर्थात् नमस्कार हो लोक के सभी अरिहंतो को, नमस्कार हो लोक के सभी सिद्धों को, नमस्कार हो लोक के सभी आचार्यों को, नमस्कार हो लोक के सभी उपाध्यायों को और नमस्कार हो लोक के सभी साधुओं को।_ *णमोकार महामंत्र की विशेषता -* *1- रचना -* _णमोकार महामंत्र की रचना किसी ने नहीं की है यह स्वयमेव रचा हुआ है, शाश्वत है, अनादिकाल से प्रवर्तमान अनादि अनिधन मंत्र है। इस मंत्र को ईसा की पहली शताब्दी में सर्वप्रथम आचार्य श्री पुष्पदंत मुनि और आचार्य श्री भूतबली जी मुनि ने षट् खण्डागम ग्रंथ में मंगलाचरण के रूप में प्राकृत भाषा में आर्या छन्द में लिपिबद्ध किया था।_ *2- विषय -* _इस मंत्र में पञ्च परमेष्ठियों को नमस्कार किया गया है। जो परम पद में स्थित होते है तथा जो आत्मा के पदों और गुणों में सबसे बड़े होते है तथा राजा, महाराजा व इन्द्र भी जिनको सिर झुकाते हैं, उन्हें परमेष्ठी कहते है। परमेष्ठी पांच होते है - अरिहंत परमेष्ठी, सिद्ध परमेष्ठी, आचार्य परमेष्ठी, उपाध्याय परमेष्ठी और साधु परमेष्ठी।_ *3- बनावट -* _इस मंत्र में 5 पद, 35 अक्षर और 58 मात्राएं है। णमो अरिहंताणं में 7 अक्षर 11 मात्राएं, णमो सिद्धाणं में 5 अक्षर 9 मात्राएं, णमो आइरियाणं में 7 अक्षर 11 मात्राएं, णमो उवज्झायाणं में 7 अक्षर 12 मात्राएं, णमो लोए सव्व साहूणं में 9 अक्षर 15 मात्राएं है।_ *4- अनेक नाम -* _णमोकार मंत्र को नमस्कार मंत्र, पञ्च परमेष्ठी मंत्र, पञ्च नमस्कार मंत्र,अनादिमूलमंत्र,अनादि अनिधन मंत्र, अपराजित मंत्र, महामंत्र, मूलमंत्र,मंत्रराज,सर्वकालिक मंत्र,मोक्ष प्रदायक मंत्र,पंच मंगल मंत्र, पैंतीस अक्षर वाला मंत्र आदि नामों से भी जाना जाता है।_ *5- उच्चारण -* _शुद्ध उच्चारण करते हुए एक बार णमोकार मंत्र पढ़ते हुए तीन श्वासोच्छवास लगते है।_ *6- साधन -* _इस णमोकार मंत्र से चौरासी लाख मंत्रों की उत्पत्ति हुई है।_ *7- फल -* _यह णमोकार मंत्र वाचक जाप से मानस जाप में हजार गुणा अधिक पुण्य संचय कराता है। धवला ग्रंथ में आया है कि चलते-फिरते, उठते-बैठते णमोकार मंत्र को भाव सहित पढ़ने से अनन्त गुणी कर्मों की निर्जरा होती है।_ *8- सार्वभौमिकता -* _णमोकार मंत्र में किसी विशेष व्यक्ति,जाति या वर्ग का नाम नहीं आता है। यह सभी अरिहंतों, सिद्धों, आचार्यों, उपाध्यायों और साधुओं का समर्पण पूर्वक सम्मान करता है।_ *9- आत्मिक शुद्धि -* _इस मंत्र का जाप साधक को मन और आत्मा की शुद्धि की दिशा में प्रेरित करता है। यह भावनाओं और विचारों को संयमित करने का साधन है। यह मंत्र जैन-धर्म का प्रमुख मंत्र होने के बावजूद सम्पूर्ण मानवता के कल्याण का संदेश देता है और सभी को आत्मिक शांति और सुख प्रदान करने की दिशा में अग्रसर करता है।_ *10- पवित्रता -* _यह मंत्र अत्यंत पवित्र है और इसे जैन साधक दिन-रात जपते हैं। इसके द्वारा आत्मा के चारित्रिक दोष दूर होते है और संयम, त्याग और साधना में वृत्ति बढ़ती है।_ *11- अहिंसा का संदेश -* _णमोकार मंत्र अहिंसा, करूणा और सर्वकल्याण का प्रतीक है। इसमें किसी जीव या वस्तु के प्रति हिंसा का कोई भाव नहीं है, अपितु परमेष्ठी के गुणों का गुणानुवाद ही है।_ *12- कर्म निर्जरा -* _यह मंत्र जैन साधकों को कर्मों की निर्जरा (कर्मों का नाश) की दिशा में प्रेरित करता है। इसका नियमित उच्चारण जीवन में धर्म का विकास करता है और आत्मा को शुद्ध करने में सहायक होता है।_ *13- समता भाव -* _इस मंत्र में किसी एक विशेष गुरु या भगवान का नाम नहीं लिया गया है। यह सभी को समान भाव से नमस्कार करता है, जिससे समता गुण विकसित होता है।_ *णमोकार मंत्र के जाप के समय रखने योग्य शुद्धियां -* _णमोकार मंत्र का जाप करने के लिए सर्वप्रथम आठ प्रकार की शुद्धियों का होना आवश्यक है।_ *1- द्रव्य शुद्धि -* _पंचेन्द्रिय तथा मन को वश कर कषाय और परिग्रह का शक्ति के अनुसार त्याग कर कोमल और दयालु चित्त हो जाप करना। यहां द्रव्य शुद्धि का अभिप्राय पात्र की अन्तरंग शुद्धि से है। जाप करने वाले को यथाशक्ति अपने विकारों को हटाकर ही जाप करना चाहिए। अन्तरंग से काम, क्रोध,लोभ,मोह,मान, माया आदि विकारों को हटाना आवश्यक है।_ *2- क्षेत्र शुद्धि -* _निराकुल स्थान, जहां हल्ला-गुल्ला न हो तथा डांह, मच्छर आदि बाधक जन्तु न हो, चित्त में क्षोभ उत्पन्न करने वाले उपद्रव एवं शीत-उष्ण की बाधा न हो,ऐसा एकान्त निर्जन स्थान जाप करने के लिए उत्तम है। घर के किसी एकांत प्रदेश में, जहां अन्य किसी प्रकार की बाधा न हो और पूर्ण शांति रह सके,उस स्थान पर भी जाप किया जा सकता है।_ *3- समय शुद्धि -* _प्रातः, मध्याह्न और सांयकाल के समय कम से कम अड़तालीस मिनट तक लगातार इस महामंत्र का जाप करना चाहिए। जाप करते समय निश्चित रहना एवं निराकुल होना परम आवश्यक है।_ *4- आसन शुद्धि -* _काष्ठ,शिला, भूमि,चटाई या शीतल पट्टी पर पूर्व दिशा या उत्तर दिशा की ओर मुख करके पद्मासन, खड्गासन या अर्ध पद्मासन होकर क्षेत्र तथा काल का प्रमाण करके मौन पूर्वक इस मंत्र का जाप करना चाहिए।_ *5- विनय शुद्धि -* _जिस आसन पर बैठकर जाप करना हो उस आसन को सावधानी पूर्वक ईर्यापथ शुद्धि के साथ साफ करना चाहिए तथा जाप करने के लिए नम्रता पूर्वक भीतर का अनुराग भी रहना आवश्यक है। जब तक जाप करने के लिए भीतर का उत्साह नहीं होगा,तब तक सच्चे मन से जाप नहीं किया जा सकता।_ *6- मन: शुद्धि -* _विचारों की गन्दगी को त्यागकर मन को एकाग्र करना, चंचल मन इधर-उधर न भटकने पाये इसकी चेष्टा करना,मन को पूर्णतया पवित्र बनाने का प्रयास करना ही इस शुद्धि में अभिप्रेत है।_ *7- वचन शुद्धि -* _धीरे-धीरे साम्यभाव पूर्वक इस मंत्र का शुद्ध जाप करना अर्थात् उच्चारण करने में अशुद्धि न होने पाये तथा उच्चारण मन ही मन में होना चाहिए।_ *8- काय शुद्धि -* _शौचादि शंकाओं से निवृत्त होकर यत्नाचार पूर्वक शरीर शुद्ध करके हलन-चलन क्रिया से रहित जाप करना चाहिए। जाप के समय शारीरिक शुद्धि का भी ध्यान रखना चाहिए।_ _इस महामंत्र का जाप यदि खड़े होकर करना हो तो तीन-तीन श्वासोच्छवासों में एक बार पढ़ना चाहिए। 108 बार के जाप में कुल 324 श्वासोच्छवास लेना चाहिए।_ *णमोकार मंत्र के जाप करने की विधि -* _जाप तीन प्रकार से किया जाता है - *वाचक* जाप, *उपांशु* जाप और *मानस* जाप।_ *वाचक* _जाप में शब्दों का उच्चारण किया जाता है अर्थात् मन्त्र को मुंह से बोल-बोल कर जाप किया जाता है।_ *उपांशु जाप* _में मंत्र को भीतर से शब्दोच्चारण की क्रिया होती है,जीभ अंदर चलती रहती है,कण्ठ स्थान पर मंत्र के शब्द गूंजते रहते है किन्तु मुख से उच्चारण नहीं किया जाता है।_ *मानस जाप* _में बाहरी और भीतरी शब्दोच्चारण का प्रयास रुक जाता है, सिर्फ मन में णमोकार मंत्र का चिन्तन होता रहता है। यही क्रिया ध्यान का रूप धारण करती है।_ *यशस्तिलक चम्पु* _में कहा गया है -_ *वचसा वा मनसा वा कार्यो जाप्य: सव्याहितस्रान्ते।* *शतगुणमाद्ये पुण्ये सहस्रसंख्यं द्वितीये तु।।* _वाचक जाप से उपांशु जाप में शतगुणा पुण्य और उपांशु जाप की अपेक्षा मानस जाप में सहस्रगुणा पुण्य होता है। मानस जाप ही ध्यान का रूप है, यह अन्तर्जल्प रहित मौन रूप होता है।_ *णमोकार महामंत्र का महात्म्य -* *ऐसो पंच णमोयारो,सव्व पावप्पणासणो।* *मंगलाणं च सव्वेसिं,पढमं होई मंगलं।।* _यह पंच नमस्कार मंत्र सब पापों को नष्ट करने वाला है और सब मंगलों में पहला मंगल है। इसलिए प्रत्येक शुभ कार्य करने के पहले यह मंत्र जरुर बोलना चाहिए।_ _यह मंत्र प्रत्येक मनुष्य पढ़ सकते है। संसार में जितने भी मन्त्रों का प्रचलन है उनमें से यह णमोकार महामंत्र सबसे महान् है। इस मंत्र को प्रतिदिन 108 बार मन लगाकर जाप करने से सभी रोग,संकट, आपत्तियां, दुःख आदि दूर हो जाते है। समस्त सुखों की प्राप्ति होती है और अंत में मोक्ष प्राप्त होता है। अतः प्रतिदिन इस मंत्र को 108 बार अवश्य जपना चाहिए।_ *दु:खे सुखे भयस्थाने,पथि दुर्गे रणेऽपि वा।* *श्री पंचगुरुमंत्रस्य,पाठ: कार्य: पदे पदे।।* _अर्थात् - दुःख में, सुख में,डर के स्थान में, मार्ग में, भयानक स्थान में, युद्ध के मैदान में, कदम-कदम पर णमोकार मंत्र का जाप करना चाहिए।_ _यह महामंत्र तीनों लोकों में अनुपम है,इस मंत्र के समान चमत्कारी और प्रभावशाली अन्य कई मंत्र नहीं है, यह समस्त पापों का अरि है। इस मंत्र का जाप करने से किसी भी प्रकार का पाप नष्ट हुए बिना नहीं रहता है,जिस प्रकार अग्नि का एक कण घांस-फूस के बड़े-बड़े ढेरों को नष्ट कर देता है,उसी प्रकार यह मंत्र सभी तरह के पापों को नष्ट करने वाला होने के कारण पापारि है। यह मंत्र संसार का उच्छेदक, व्यक्ति के भाव संसार राग -द्वेष आदि और द्रव्य संसार ज्ञानावरण आदि कर्मों का विनाशक है,तिक्ष्ण विषों का नाश करने वाला है अर्थात् इस महामंत्र के प्रभाव से सभी प्रकार की विष-बाधाएं दूर हो जाती है। इस मंत्र का भाव सहित उच्चारण करने से कर्मों की निर्जरा होती है तथा योग-निरोध पूर्वक इसका स्मरण करने से कर्मों का विनाश होता है। यह मंत्र सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाला है,भाव सहित और विधि सहित इस मंत्र का अनुष्ठान करने से सभी तरह की लौकिक-अलौकिक सिद्धियां प्राप्त हो जाती है,साधक जिस वस्तु की कामना करता है,वह उसे प्राप्त हो जाती है। दुर्लभ और असम्भव कार्य भी इस महामंत्र की साधना से पूर्ण हो जाते है, यह मंत्र मोक्ष-सुख को उत्पन्न करने वाला है। यह मंत्र केवलज्ञान मंत्र कहलाता है अर्थात् इसके जाप से केवलज्ञान की प्राप्ति होती है तथा यही मंत्र निर्वाण सुख को देने वाला भी है।_ _पवित्र या अपवित्र अथवा सोते, जागते,चलते, फिरते किसी भी अवस्था में इस णमोकार मंत्र का स्मरण करने से आत्मा सर्वपापों से मुक्त हो जाता है,शरीर और मन पवित्र हो जाते है। यह मंत्र आत्मा को पवित्र करने वाला है। यह णमोकार मंत्र अपराजित है, अन्य किसी मंत्र द्वारा इसकी शक्ति प्रतिहत अवरूद्ध नहीं की जा सकती है, इसमें अद्भुत सामर्थ्य निहित है। समस्त विध्नों को क्षणभर में ही दूर किया जा सकता है। जिस प्रकार हलाहल विष तत्काल अपना फल देता है और उसका फल अव्यर्थ होता है,उसी प्रकार णमोकार मंत्र भी तत्काल शुभ पुण्य का आस्रव करता है तथा अशुभोदय के प्रभाव को क्षीण करता है। यह सम्यक्त्व की वृद्धि में सहायक होता है। मनुष्य जीवन-भर पापास्रव करने पर भी अन्तिम समय में इस महामंत्र के स्मरण के प्रभाव से स्वर्गादि सुखों को प्राप्त कर लेता है। यह णमोकार मंत्र सभी प्रकार की आकुलताओं को दूर करने वाला है।_ _मरणोन्मुख कुत्ते को जीवन्धर स्वामी ने करुणावश णमोकार मंत्र सुनाया था,इस मंत्र के प्रभाव से वह पापाचारी श्वान देवता के रूप में उत्पन्न हुआ। अतः सिद्ध है कि यह मंत्र आत्म विशुद्धि का बहुत बड़ा कारण है। णमोकार मंत्र के एक अक्षर का भी भाव सहित स्मरण करने से सात सागर तक भोगा जाने वाला पाप नष्ट हो जाता है, एक पद भाव सहित स्मरण करने से पचास सागर तक भोगे जाने वाले पाप का नाश होता है और समग्र मंत्र का भक्ति भाव सहित विधि पूर्वक स्मरण करने से पांच सौ सागर तक भोगे जाने वाले पाप का नाश हो जाता है। भाव सहित स्मरण किया गया यह णमोकार मंत्र असंख्य दुःखों को क्षय करने वाला तथा इह लौकिक और पारलौकिक समस्त सुखों को देने वाला है। इस पंचमकाल में कल्पवृक्ष के समान सभी मनोरथों को पूर्ण करने वाला यह मंत्र ही है, अतः संसारी प्राणियों को इसका जाप अवश्य करना चाहिए। जिस अज्ञान,पाप और संक्लेश के अन्धकार को सूर्य, चन्द्र और दीपक दूर नहीं कर सकते हैं,उस घने अन्धकार को यह मंत्र नष्ट कर देता है।_ ??????? 2026-04-09 04:54:59
70497 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी 2026-04-09 04:43:54
70498 49028270 1.श्री सम्मेद शिखर जी 2026-04-09 04:43:54
70496 40449703 गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ *दर्जी की तकदीर* एक बार किसी देश का राजा अपनी प्रजा का हाल-चाल पूछने के लिए गाँवों में घूम रहा था। घूमते-घूमते उसके कुर्ते का बटन टूट गया, उसने अपने मंत्री को कहा कि इस गांव में कौन सा दर्जी है, जो मेरे बटन को सिल सके ! ? उस गांव में सिर्फ एक ही दर्जी था, जो कपड़े सिलने का काम करता था। उसको राजा के सामने ले जाया गया । राजा ने कहा कि तुम मेरे कुर्ते का बटन सी सकते हो ? ? दर्जी ने कहा यह कोई मुश्किल काम थोड़े ही है ! उसने मन्त्री से बटन ले लिया, धागे से उसने राजा के कुर्ते का बटन फौरन टांक दिया। क्योंकि बटन भी राजा का था, सिर्फ उसने अपना धागा प्रयोग किया था, राजा ने दर्जी से पूछा कि कितने पैसे दूं ? ? उसने कहा :- "महाराज रहने दो, छोटा सा काम था !" उसने मन में सोचा कि बटन राजा के पास था, उसने तो सिर्फ धागा ही लगाया है !! ? राजा ने फिर से दर्जी को कहा कि नहीं-नहीं, बोलो कितने दूं ? ? दर्जी ने सोचा की दो रूपये मांग लेता हूँ। फिर मन में यही सोच आ गयी कि कहीं राजा यह न सोचे की बटन टांकने के मेरे से दो रुपये ले रहा है, तो गाँव वालों से कितना लेता होगा, क्योंकि उस जमाने में दो रुपये की कीमत बहुत होती थी ! ? दर्जी ने राजा से कहा कि :- "महाराज जो भी आपकी इच्छा हो, दे दीजिए ।" ? अब राजा तो राजा था। उसको अपने हिसाब से देना था। कहीं देने में उसकी इज्जत ख़राब न हो जाये। उसने अपने मंत्री को कहा कि इस दर्जी को दो गांव दे दो, यह हमारा हुक्म है। ? यहाँ दर्जी सिर्फ दो रुपये की मांग कर रहा था पर राजा ने उसको दो गांव दे दिए । ? इसी तरह जब हम प्रभु पर सब कुछ छोड़ते हैं, तो वह अपने हिसाब से देता है और मांगते हैं, तो सिर्फ हम मांगने में कमी कर जाते हैं । देने वाला तो पता नहीं क्या देना चाहता है, अपनी हैसियत से और हम बड़ी तुच्छ वस्तु मांग लेते हैं । ? *इसलिए संत-महात्मा कहते है, ईश्वर को अपना सब सर्मपण कर दो, उनसे कभी कुछ न मांगों, जो वो अपने आप दें, बस उसी से संतुष्ट रहो। फिर देखो उसकी लीला। वारे के न्यारे हो जाएंगे। जीवन में धन के साथ सन्तुष्टि का होना जरूरी है।* तुलसी साथी विपत्ति के विद्या, विनय, विवेक, साहस, सुकृति, सुसत्यव्रत, राम भरोसे एक। *अर्थात* तुलसीदासजी कहते है कि किसी भी विपदा से यह सात गुण आपको बचाएंगे.. १ आपकी विद्या, ज्ञान। २ आपका विनय, विवेक। ३ आपके अंदर का साहस, पराक्रम। ४ आपकी बुद्धि, प्रज्ञा। ५ आपके भले कर्म। ६ आपकी सत्यनिष्ठा। ७ आपका भगवान के प्रति विश्वास। ? दूसरों के लिए दीपक लेकर चलोगे तो रोशनी आप पर भी पड़ेगी चेहरा आपका भी चमकेगा !! "इत्यलम 2026-04-09 04:43:23
70495 40449703 गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ *दर्जी की तकदीर* एक बार किसी देश का राजा अपनी प्रजा का हाल-चाल पूछने के लिए गाँवों में घूम रहा था। घूमते-घूमते उसके कुर्ते का बटन टूट गया, उसने अपने मंत्री को कहा कि इस गांव में कौन सा दर्जी है, जो मेरे बटन को सिल सके ! ? उस गांव में सिर्फ एक ही दर्जी था, जो कपड़े सिलने का काम करता था। उसको राजा के सामने ले जाया गया । राजा ने कहा कि तुम मेरे कुर्ते का बटन सी सकते हो ? ? दर्जी ने कहा यह कोई मुश्किल काम थोड़े ही है ! उसने मन्त्री से बटन ले लिया, धागे से उसने राजा के कुर्ते का बटन फौरन टांक दिया। क्योंकि बटन भी राजा का था, सिर्फ उसने अपना धागा प्रयोग किया था, राजा ने दर्जी से पूछा कि कितने पैसे दूं ? ? उसने कहा :- "महाराज रहने दो, छोटा सा काम था !" उसने मन में सोचा कि बटन राजा के पास था, उसने तो सिर्फ धागा ही लगाया है !! ? राजा ने फिर से दर्जी को कहा कि नहीं-नहीं, बोलो कितने दूं ? ? दर्जी ने सोचा की दो रूपये मांग लेता हूँ। फिर मन में यही सोच आ गयी कि कहीं राजा यह न सोचे की बटन टांकने के मेरे से दो रुपये ले रहा है, तो गाँव वालों से कितना लेता होगा, क्योंकि उस जमाने में दो रुपये की कीमत बहुत होती थी ! ? दर्जी ने राजा से कहा कि :- "महाराज जो भी आपकी इच्छा हो, दे दीजिए ।" ? अब राजा तो राजा था। उसको अपने हिसाब से देना था। कहीं देने में उसकी इज्जत ख़राब न हो जाये। उसने अपने मंत्री को कहा कि इस दर्जी को दो गांव दे दो, यह हमारा हुक्म है। ? यहाँ दर्जी सिर्फ दो रुपये की मांग कर रहा था पर राजा ने उसको दो गांव दे दिए । ? इसी तरह जब हम प्रभु पर सब कुछ छोड़ते हैं, तो वह अपने हिसाब से देता है और मांगते हैं, तो सिर्फ हम मांगने में कमी कर जाते हैं । देने वाला तो पता नहीं क्या देना चाहता है, अपनी हैसियत से और हम बड़ी तुच्छ वस्तु मांग लेते हैं । ? *इसलिए संत-महात्मा कहते है, ईश्वर को अपना सब सर्मपण कर दो, उनसे कभी कुछ न मांगों, जो वो अपने आप दें, बस उसी से संतुष्ट रहो। फिर देखो उसकी लीला। वारे के न्यारे हो जाएंगे। जीवन में धन के साथ सन्तुष्टि का होना जरूरी है।* तुलसी साथी विपत्ति के विद्या, विनय, विवेक, साहस, सुकृति, सुसत्यव्रत, राम भरोसे एक। *अर्थात* तुलसीदासजी कहते है कि किसी भी विपदा से यह सात गुण आपको बचाएंगे.. १ आपकी विद्या, ज्ञान। २ आपका विनय, विवेक। ३ आपके अंदर का साहस, पराक्रम। ४ आपकी बुद्धि, प्रज्ञा। ५ आपके भले कर्म। ६ आपकी सत्यनिष्ठा। ७ आपका भगवान के प्रति विश्वास। ? दूसरों के लिए दीपक लेकर चलोगे तो रोशनी आप पर भी पड़ेगी चेहरा आपका भी चमकेगा !! "इत्यलम 2026-04-09 04:43:22
70494 40449703 गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ ??? 2026-04-09 04:40:27
70493 40449703 गणिनी आर्यिका जिनदेवी माँ ??? 2026-04-09 04:40:26
70491 40449657 ?️?SARVARTHASIDDHI ??️ *णमोकार महामंत्र का महात्म्य* _जैन दर्शन में णमोकार महामंत्र जिसे नमस्कार मंत्र भी कहा जाता है, यह एक पवित्र मंत्र है। यह मंत्र जैन धर्म के मूल सिद्धांतों का प्रतीक है और इसे जैन परम्परा का सबसे प्रमुख एवं सर्व व्यापक मंत्र माना जाता है। इसका उच्चारण करने से साधक को शांति और आत्मिक बल की प्राप्ति होती है। इस मंत्र में किसकी स्तुति की गई है, इस मंत्र की विशेषता और महत्व क्या है ? इस विषय को समझते है।_ *णमोकार महामंत्र-* *णमो अरिहंताणं,* *णमो सिद्धाणं* *णमो आइरियाणं* *णमो उवज्झायाणं* *णमो लोएसव्व साहूणं।।* _अर्थात् नमस्कार हो लोक के सभी अरिहंतो को, नमस्कार हो लोक के सभी सिद्धों को, नमस्कार हो लोक के सभी आचार्यों को, नमस्कार हो लोक के सभी उपाध्यायों को और नमस्कार हो लोक के सभी साधुओं को।_ *णमोकार महामंत्र की विशेषता -* *1- रचना -* _णमोकार महामंत्र की रचना किसी ने नहीं की है यह स्वयमेव रचा हुआ है, शाश्वत है, अनादिकाल से प्रवर्तमान अनादि अनिधन मंत्र है। इस मंत्र को ईसा की पहली शताब्दी में सर्वप्रथम आचार्य श्री पुष्पदंत मुनि और आचार्य श्री भूतबली जी मुनि ने षट् खण्डागम ग्रंथ में मंगलाचरण के रूप में प्राकृत भाषा में आर्या छन्द में लिपिबद्ध किया था।_ *2- विषय -* _इस मंत्र में पञ्च परमेष्ठियों को नमस्कार किया गया है। जो परम पद में स्थित होते है तथा जो आत्मा के पदों और गुणों में सबसे बड़े होते है तथा राजा, महाराजा व इन्द्र भी जिनको सिर झुकाते हैं, उन्हें परमेष्ठी कहते है। परमेष्ठी पांच होते है - अरिहंत परमेष्ठी, सिद्ध परमेष्ठी, आचार्य परमेष्ठी, उपाध्याय परमेष्ठी और साधु परमेष्ठी।_ *3- बनावट -* _इस मंत्र में 5 पद, 35 अक्षर और 58 मात्राएं है। णमो अरिहंताणं में 7 अक्षर 11 मात्राएं, णमो सिद्धाणं में 5 अक्षर 9 मात्राएं, णमो आइरियाणं में 7 अक्षर 11 मात्राएं, णमो उवज्झायाणं में 7 अक्षर 12 मात्राएं, णमो लोए सव्व साहूणं में 9 अक्षर 15 मात्राएं है।_ *4- अनेक नाम -* _णमोकार मंत्र को नमस्कार मंत्र, पञ्च परमेष्ठी मंत्र, पञ्च नमस्कार मंत्र,अनादिमूलमंत्र,अनादि अनिधन मंत्र, अपराजित मंत्र, महामंत्र, मूलमंत्र,मंत्रराज,सर्वकालिक मंत्र,मोक्ष प्रदायक मंत्र,पंच मंगल मंत्र, पैंतीस अक्षर वाला मंत्र आदि नामों से भी जाना जाता है।_ *5- उच्चारण -* _शुद्ध उच्चारण करते हुए एक बार णमोकार मंत्र पढ़ते हुए तीन श्वासोच्छवास लगते है।_ *6- साधन -* _इस णमोकार मंत्र से चौरासी लाख मंत्रों की उत्पत्ति हुई है।_ *7- फल -* _यह णमोकार मंत्र वाचक जाप से मानस जाप में हजार गुणा अधिक पुण्य संचय कराता है। धवला ग्रंथ में आया है कि चलते-फिरते, उठते-बैठते णमोकार मंत्र को भाव सहित पढ़ने से अनन्त गुणी कर्मों की निर्जरा होती है।_ *8- सार्वभौमिकता -* _णमोकार मंत्र में किसी विशेष व्यक्ति,जाति या वर्ग का नाम नहीं आता है। यह सभी अरिहंतों, सिद्धों, आचार्यों, उपाध्यायों और साधुओं का समर्पण पूर्वक सम्मान करता है।_ *9- आत्मिक शुद्धि -* _इस मंत्र का जाप साधक को मन और आत्मा की शुद्धि की दिशा में प्रेरित करता है। यह भावनाओं और विचारों को संयमित करने का साधन है। यह मंत्र जैन-धर्म का प्रमुख मंत्र होने के बावजूद सम्पूर्ण मानवता के कल्याण का संदेश देता है और सभी को आत्मिक शांति और सुख प्रदान करने की दिशा में अग्रसर करता है।_ *10- पवित्रता -* _यह मंत्र अत्यंत पवित्र है और इसे जैन साधक दिन-रात जपते हैं। इसके द्वारा आत्मा के चारित्रिक दोष दूर होते है और संयम, त्याग और साधना में वृत्ति बढ़ती है।_ *11- अहिंसा का संदेश -* _णमोकार मंत्र अहिंसा, करूणा और सर्वकल्याण का प्रतीक है। इसमें किसी जीव या वस्तु के प्रति हिंसा का कोई भाव नहीं है, अपितु परमेष्ठी के गुणों का गुणानुवाद ही है।_ *12- कर्म निर्जरा -* _यह मंत्र जैन साधकों को कर्मों की निर्जरा (कर्मों का नाश) की दिशा में प्रेरित करता है। इसका नियमित उच्चारण जीवन में धर्म का विकास करता है और आत्मा को शुद्ध करने में सहायक होता है।_ *13- समता भाव -* _इस मंत्र में किसी एक विशेष गुरु या भगवान का नाम नहीं लिया गया है। यह सभी को समान भाव से नमस्कार करता है, जिससे समता गुण विकसित होता है।_ *णमोकार मंत्र के जाप के समय रखने योग्य शुद्धियां -* _णमोकार मंत्र का जाप करने के लिए सर्वप्रथम आठ प्रकार की शुद्धियों का होना आवश्यक है।_ *1- द्रव्य शुद्धि -* _पंचेन्द्रिय तथा मन को वश कर कषाय और परिग्रह का शक्ति के अनुसार त्याग कर कोमल और दयालु चित्त हो जाप करना। यहां द्रव्य शुद्धि का अभिप्राय पात्र की अन्तरंग शुद्धि से है। जाप करने वाले को यथाशक्ति अपने विकारों को हटाकर ही जाप करना चाहिए। अन्तरंग से काम, क्रोध,लोभ,मोह,मान, माया आदि विकारों को हटाना आवश्यक है।_ *2- क्षेत्र शुद्धि -* _निराकुल स्थान, जहां हल्ला-गुल्ला न हो तथा डांह, मच्छर आदि बाधक जन्तु न हो, चित्त में क्षोभ उत्पन्न करने वाले उपद्रव एवं शीत-उष्ण की बाधा न हो,ऐसा एकान्त निर्जन स्थान जाप करने के लिए उत्तम है। घर के किसी एकांत प्रदेश में, जहां अन्य किसी प्रकार की बाधा न हो और पूर्ण शांति रह सके,उस स्थान पर भी जाप किया जा सकता है।_ *3- समय शुद्धि -* _प्रातः, मध्याह्न और सांयकाल के समय कम से कम अड़तालीस मिनट तक लगातार इस महामंत्र का जाप करना चाहिए। जाप करते समय निश्चित रहना एवं निराकुल होना परम आवश्यक है।_ *4- आसन शुद्धि -* _काष्ठ,शिला, भूमि,चटाई या शीतल पट्टी पर पूर्व दिशा या उत्तर दिशा की ओर मुख करके पद्मासन, खड्गासन या अर्ध पद्मासन होकर क्षेत्र तथा काल का प्रमाण करके मौन पूर्वक इस मंत्र का जाप करना चाहिए।_ *5- विनय शुद्धि -* _जिस आसन पर बैठकर जाप करना हो उस आसन को सावधानी पूर्वक ईर्यापथ शुद्धि के साथ साफ करना चाहिए तथा जाप करने के लिए नम्रता पूर्वक भीतर का अनुराग भी रहना आवश्यक है। जब तक जाप करने के लिए भीतर का उत्साह नहीं होगा,तब तक सच्चे मन से जाप नहीं किया जा सकता।_ *6- मन: शुद्धि -* _विचारों की गन्दगी को त्यागकर मन को एकाग्र करना, चंचल मन इधर-उधर न भटकने पाये इसकी चेष्टा करना,मन को पूर्णतया पवित्र बनाने का प्रयास करना ही इस शुद्धि में अभिप्रेत है।_ *7- वचन शुद्धि -* _धीरे-धीरे साम्यभाव पूर्वक इस मंत्र का शुद्ध जाप करना अर्थात् उच्चारण करने में अशुद्धि न होने पाये तथा उच्चारण मन ही मन में होना चाहिए।_ *8- काय शुद्धि -* _शौचादि शंकाओं से निवृत्त होकर यत्नाचार पूर्वक शरीर शुद्ध करके हलन-चलन क्रिया से रहित जाप करना चाहिए। जाप के समय शारीरिक शुद्धि का भी ध्यान रखना चाहिए।_ _इस महामंत्र का जाप यदि खड़े होकर करना हो तो तीन-तीन श्वासोच्छवासों में एक बार पढ़ना चाहिए। 108 बार के जाप में कुल 324 श्वासोच्छवास लेना चाहिए।_ *णमोकार मंत्र के जाप करने की विधि -* _जाप तीन प्रकार से किया जाता है - *वाचक* जाप, *उपांशु* जाप और *मानस* जाप।_ *वाचक* _जाप में शब्दों का उच्चारण किया जाता है अर्थात् मन्त्र को मुंह से बोल-बोल कर जाप किया जाता है।_ *उपांशु जाप* _में मंत्र को भीतर से शब्दोच्चारण की क्रिया होती है,जीभ अंदर चलती रहती है,कण्ठ स्थान पर मंत्र के शब्द गूंजते रहते है किन्तु मुख से उच्चारण नहीं किया जाता है।_ *मानस जाप* _में बाहरी और भीतरी शब्दोच्चारण का प्रयास रुक जाता है, सिर्फ मन में णमोकार मंत्र का चिन्तन होता रहता है। यही क्रिया ध्यान का रूप धारण करती है।_ *यशस्तिलक चम्पु* _में कहा गया है -_ *वचसा वा मनसा वा कार्यो जाप्य: सव्याहितस्रान्ते।* *शतगुणमाद्ये पुण्ये सहस्रसंख्यं द्वितीये तु।।* _वाचक जाप से उपांशु जाप में शतगुणा पुण्य और उपांशु जाप की अपेक्षा मानस जाप में सहस्रगुणा पुण्य होता है। मानस जाप ही ध्यान का रूप है, यह अन्तर्जल्प रहित मौन रूप होता है।_ *णमोकार महामंत्र का महात्म्य -* *ऐसो पंच णमोयारो,सव्व पावप्पणासणो।* *मंगलाणं च सव्वेसिं,पढमं होई मंगलं।।* _यह पंच नमस्कार मंत्र सब पापों को नष्ट करने वाला है और सब मंगलों में पहला मंगल है। इसलिए प्रत्येक शुभ कार्य करने के पहले यह मंत्र जरुर बोलना चाहिए।_ _यह मंत्र प्रत्येक मनुष्य पढ़ सकते है। संसार में जितने भी मन्त्रों का प्रचलन है उनमें से यह णमोकार महामंत्र सबसे महान् है। इस मंत्र को प्रतिदिन 108 बार मन लगाकर जाप करने से सभी रोग,संकट, आपत्तियां, दुःख आदि दूर हो जाते है। समस्त सुखों की प्राप्ति होती है और अंत में मोक्ष प्राप्त होता है। अतः प्रतिदिन इस मंत्र को 108 बार अवश्य जपना चाहिए।_ *दु:खे सुखे भयस्थाने,पथि दुर्गे रणेऽपि वा।* *श्री पंचगुरुमंत्रस्य,पाठ: कार्य: पदे पदे।।* _अर्थात् - दुःख में, सुख में,डर के स्थान में, मार्ग में, भयानक स्थान में, युद्ध के मैदान में, कदम-कदम पर णमोकार मंत्र का जाप करना चाहिए।_ _यह महामंत्र तीनों लोकों में अनुपम है,इस मंत्र के समान चमत्कारी और प्रभावशाली अन्य कई मंत्र नहीं है, यह समस्त पापों का अरि है। इस मंत्र का जाप करने से किसी भी प्रकार का पाप नष्ट हुए बिना नहीं रहता है,जिस प्रकार अग्नि का एक कण घांस-फूस के बड़े-बड़े ढेरों को नष्ट कर देता है,उसी प्रकार यह मंत्र सभी तरह के पापों को नष्ट करने वाला होने के कारण पापारि है। यह मंत्र संसार का उच्छेदक, व्यक्ति के भाव संसार राग -द्वेष आदि और द्रव्य संसार ज्ञानावरण आदि कर्मों का विनाशक है,तिक्ष्ण विषों का नाश करने वाला है अर्थात् इस महामंत्र के प्रभाव से सभी प्रकार की विष-बाधाएं दूर हो जाती है। इस मंत्र का भाव सहित उच्चारण करने से कर्मों की निर्जरा होती है तथा योग-निरोध पूर्वक इसका स्मरण करने से कर्मों का विनाश होता है। यह मंत्र सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाला है,भाव सहित और विधि सहित इस मंत्र का अनुष्ठान करने से सभी तरह की लौकिक-अलौकिक सिद्धियां प्राप्त हो जाती है,साधक जिस वस्तु की कामना करता है,वह उसे प्राप्त हो जाती है। दुर्लभ और असम्भव कार्य भी इस महामंत्र की साधना से पूर्ण हो जाते है, यह मंत्र मोक्ष-सुख को उत्पन्न करने वाला है। यह मंत्र केवलज्ञान मंत्र कहलाता है अर्थात् इसके जाप से केवलज्ञान की प्राप्ति होती है तथा यही मंत्र निर्वाण सुख को देने वाला भी है।_ _पवित्र या अपवित्र अथवा सोते, जागते,चलते, फिरते किसी भी अवस्था में इस णमोकार मंत्र का स्मरण करने से आत्मा सर्वपापों से मुक्त हो जाता है,शरीर और मन पवित्र हो जाते है। यह मंत्र आत्मा को पवित्र करने वाला है। यह णमोकार मंत्र अपराजित है, अन्य किसी मंत्र द्वारा इसकी शक्ति प्रतिहत अवरूद्ध नहीं की जा सकती है, इसमें अद्भुत सामर्थ्य निहित है। समस्त विध्नों को क्षणभर में ही दूर किया जा सकता है। जिस प्रकार हलाहल विष तत्काल अपना फल देता है और उसका फल अव्यर्थ होता है,उसी प्रकार णमोकार मंत्र भी तत्काल शुभ पुण्य का आस्रव करता है तथा अशुभोदय के प्रभाव को क्षीण करता है। यह सम्यक्त्व की वृद्धि में सहायक होता है। मनुष्य जीवन-भर पापास्रव करने पर भी अन्तिम समय में इस महामंत्र के स्मरण के प्रभाव से स्वर्गादि सुखों को प्राप्त कर लेता है। यह णमोकार मंत्र सभी प्रकार की आकुलताओं को दूर करने वाला है।_ _मरणोन्मुख कुत्ते को जीवन्धर स्वामी ने करुणावश णमोकार मंत्र सुनाया था,इस मंत्र के प्रभाव से वह पापाचारी श्वान देवता के रूप में उत्पन्न हुआ। अतः सिद्ध है कि यह मंत्र आत्म विशुद्धि का बहुत बड़ा कारण है। णमोकार मंत्र के एक अक्षर का भी भाव सहित स्मरण करने से सात सागर तक भोगा जाने वाला पाप नष्ट हो जाता है, एक पद भाव सहित स्मरण करने से पचास सागर तक भोगे जाने वाले पाप का नाश होता है और समग्र मंत्र का भक्ति भाव सहित विधि पूर्वक स्मरण करने से पांच सौ सागर तक भोगे जाने वाले पाप का नाश हो जाता है। भाव सहित स्मरण किया गया यह णमोकार मंत्र असंख्य दुःखों को क्षय करने वाला तथा इह लौकिक और पारलौकिक समस्त सुखों को देने वाला है। इस पंचमकाल में कल्पवृक्ष के समान सभी मनोरथों को पूर्ण करने वाला यह मंत्र ही है, अतः संसारी प्राणियों को इसका जाप अवश्य करना चाहिए। जिस अज्ञान,पाप और संक्लेश के अन्धकार को सूर्य, चन्द्र और दीपक दूर नहीं कर सकते हैं,उस घने अन्धकार को यह मंत्र नष्ट कर देता है।_ ??????? 2026-04-09 04:40:01
70492 40449657 ?️?SARVARTHASIDDHI ??️ *णमोकार महामंत्र का महात्म्य* _जैन दर्शन में णमोकार महामंत्र जिसे नमस्कार मंत्र भी कहा जाता है, यह एक पवित्र मंत्र है। यह मंत्र जैन धर्म के मूल सिद्धांतों का प्रतीक है और इसे जैन परम्परा का सबसे प्रमुख एवं सर्व व्यापक मंत्र माना जाता है। इसका उच्चारण करने से साधक को शांति और आत्मिक बल की प्राप्ति होती है। इस मंत्र में किसकी स्तुति की गई है, इस मंत्र की विशेषता और महत्व क्या है ? इस विषय को समझते है।_ *णमोकार महामंत्र-* *णमो अरिहंताणं,* *णमो सिद्धाणं* *णमो आइरियाणं* *णमो उवज्झायाणं* *णमो लोएसव्व साहूणं।।* _अर्थात् नमस्कार हो लोक के सभी अरिहंतो को, नमस्कार हो लोक के सभी सिद्धों को, नमस्कार हो लोक के सभी आचार्यों को, नमस्कार हो लोक के सभी उपाध्यायों को और नमस्कार हो लोक के सभी साधुओं को।_ *णमोकार महामंत्र की विशेषता -* *1- रचना -* _णमोकार महामंत्र की रचना किसी ने नहीं की है यह स्वयमेव रचा हुआ है, शाश्वत है, अनादिकाल से प्रवर्तमान अनादि अनिधन मंत्र है। इस मंत्र को ईसा की पहली शताब्दी में सर्वप्रथम आचार्य श्री पुष्पदंत मुनि और आचार्य श्री भूतबली जी मुनि ने षट् खण्डागम ग्रंथ में मंगलाचरण के रूप में प्राकृत भाषा में आर्या छन्द में लिपिबद्ध किया था।_ *2- विषय -* _इस मंत्र में पञ्च परमेष्ठियों को नमस्कार किया गया है। जो परम पद में स्थित होते है तथा जो आत्मा के पदों और गुणों में सबसे बड़े होते है तथा राजा, महाराजा व इन्द्र भी जिनको सिर झुकाते हैं, उन्हें परमेष्ठी कहते है। परमेष्ठी पांच होते है - अरिहंत परमेष्ठी, सिद्ध परमेष्ठी, आचार्य परमेष्ठी, उपाध्याय परमेष्ठी और साधु परमेष्ठी।_ *3- बनावट -* _इस मंत्र में 5 पद, 35 अक्षर और 58 मात्राएं है। णमो अरिहंताणं में 7 अक्षर 11 मात्राएं, णमो सिद्धाणं में 5 अक्षर 9 मात्राएं, णमो आइरियाणं में 7 अक्षर 11 मात्राएं, णमो उवज्झायाणं में 7 अक्षर 12 मात्राएं, णमो लोए सव्व साहूणं में 9 अक्षर 15 मात्राएं है।_ *4- अनेक नाम -* _णमोकार मंत्र को नमस्कार मंत्र, पञ्च परमेष्ठी मंत्र, पञ्च नमस्कार मंत्र,अनादिमूलमंत्र,अनादि अनिधन मंत्र, अपराजित मंत्र, महामंत्र, मूलमंत्र,मंत्रराज,सर्वकालिक मंत्र,मोक्ष प्रदायक मंत्र,पंच मंगल मंत्र, पैंतीस अक्षर वाला मंत्र आदि नामों से भी जाना जाता है।_ *5- उच्चारण -* _शुद्ध उच्चारण करते हुए एक बार णमोकार मंत्र पढ़ते हुए तीन श्वासोच्छवास लगते है।_ *6- साधन -* _इस णमोकार मंत्र से चौरासी लाख मंत्रों की उत्पत्ति हुई है।_ *7- फल -* _यह णमोकार मंत्र वाचक जाप से मानस जाप में हजार गुणा अधिक पुण्य संचय कराता है। धवला ग्रंथ में आया है कि चलते-फिरते, उठते-बैठते णमोकार मंत्र को भाव सहित पढ़ने से अनन्त गुणी कर्मों की निर्जरा होती है।_ *8- सार्वभौमिकता -* _णमोकार मंत्र में किसी विशेष व्यक्ति,जाति या वर्ग का नाम नहीं आता है। यह सभी अरिहंतों, सिद्धों, आचार्यों, उपाध्यायों और साधुओं का समर्पण पूर्वक सम्मान करता है।_ *9- आत्मिक शुद्धि -* _इस मंत्र का जाप साधक को मन और आत्मा की शुद्धि की दिशा में प्रेरित करता है। यह भावनाओं और विचारों को संयमित करने का साधन है। यह मंत्र जैन-धर्म का प्रमुख मंत्र होने के बावजूद सम्पूर्ण मानवता के कल्याण का संदेश देता है और सभी को आत्मिक शांति और सुख प्रदान करने की दिशा में अग्रसर करता है।_ *10- पवित्रता -* _यह मंत्र अत्यंत पवित्र है और इसे जैन साधक दिन-रात जपते हैं। इसके द्वारा आत्मा के चारित्रिक दोष दूर होते है और संयम, त्याग और साधना में वृत्ति बढ़ती है।_ *11- अहिंसा का संदेश -* _णमोकार मंत्र अहिंसा, करूणा और सर्वकल्याण का प्रतीक है। इसमें किसी जीव या वस्तु के प्रति हिंसा का कोई भाव नहीं है, अपितु परमेष्ठी के गुणों का गुणानुवाद ही है।_ *12- कर्म निर्जरा -* _यह मंत्र जैन साधकों को कर्मों की निर्जरा (कर्मों का नाश) की दिशा में प्रेरित करता है। इसका नियमित उच्चारण जीवन में धर्म का विकास करता है और आत्मा को शुद्ध करने में सहायक होता है।_ *13- समता भाव -* _इस मंत्र में किसी एक विशेष गुरु या भगवान का नाम नहीं लिया गया है। यह सभी को समान भाव से नमस्कार करता है, जिससे समता गुण विकसित होता है।_ *णमोकार मंत्र के जाप के समय रखने योग्य शुद्धियां -* _णमोकार मंत्र का जाप करने के लिए सर्वप्रथम आठ प्रकार की शुद्धियों का होना आवश्यक है।_ *1- द्रव्य शुद्धि -* _पंचेन्द्रिय तथा मन को वश कर कषाय और परिग्रह का शक्ति के अनुसार त्याग कर कोमल और दयालु चित्त हो जाप करना। यहां द्रव्य शुद्धि का अभिप्राय पात्र की अन्तरंग शुद्धि से है। जाप करने वाले को यथाशक्ति अपने विकारों को हटाकर ही जाप करना चाहिए। अन्तरंग से काम, क्रोध,लोभ,मोह,मान, माया आदि विकारों को हटाना आवश्यक है।_ *2- क्षेत्र शुद्धि -* _निराकुल स्थान, जहां हल्ला-गुल्ला न हो तथा डांह, मच्छर आदि बाधक जन्तु न हो, चित्त में क्षोभ उत्पन्न करने वाले उपद्रव एवं शीत-उष्ण की बाधा न हो,ऐसा एकान्त निर्जन स्थान जाप करने के लिए उत्तम है। घर के किसी एकांत प्रदेश में, जहां अन्य किसी प्रकार की बाधा न हो और पूर्ण शांति रह सके,उस स्थान पर भी जाप किया जा सकता है।_ *3- समय शुद्धि -* _प्रातः, मध्याह्न और सांयकाल के समय कम से कम अड़तालीस मिनट तक लगातार इस महामंत्र का जाप करना चाहिए। जाप करते समय निश्चित रहना एवं निराकुल होना परम आवश्यक है।_ *4- आसन शुद्धि -* _काष्ठ,शिला, भूमि,चटाई या शीतल पट्टी पर पूर्व दिशा या उत्तर दिशा की ओर मुख करके पद्मासन, खड्गासन या अर्ध पद्मासन होकर क्षेत्र तथा काल का प्रमाण करके मौन पूर्वक इस मंत्र का जाप करना चाहिए।_ *5- विनय शुद्धि -* _जिस आसन पर बैठकर जाप करना हो उस आसन को सावधानी पूर्वक ईर्यापथ शुद्धि के साथ साफ करना चाहिए तथा जाप करने के लिए नम्रता पूर्वक भीतर का अनुराग भी रहना आवश्यक है। जब तक जाप करने के लिए भीतर का उत्साह नहीं होगा,तब तक सच्चे मन से जाप नहीं किया जा सकता।_ *6- मन: शुद्धि -* _विचारों की गन्दगी को त्यागकर मन को एकाग्र करना, चंचल मन इधर-उधर न भटकने पाये इसकी चेष्टा करना,मन को पूर्णतया पवित्र बनाने का प्रयास करना ही इस शुद्धि में अभिप्रेत है।_ *7- वचन शुद्धि -* _धीरे-धीरे साम्यभाव पूर्वक इस मंत्र का शुद्ध जाप करना अर्थात् उच्चारण करने में अशुद्धि न होने पाये तथा उच्चारण मन ही मन में होना चाहिए।_ *8- काय शुद्धि -* _शौचादि शंकाओं से निवृत्त होकर यत्नाचार पूर्वक शरीर शुद्ध करके हलन-चलन क्रिया से रहित जाप करना चाहिए। जाप के समय शारीरिक शुद्धि का भी ध्यान रखना चाहिए।_ _इस महामंत्र का जाप यदि खड़े होकर करना हो तो तीन-तीन श्वासोच्छवासों में एक बार पढ़ना चाहिए। 108 बार के जाप में कुल 324 श्वासोच्छवास लेना चाहिए।_ *णमोकार मंत्र के जाप करने की विधि -* _जाप तीन प्रकार से किया जाता है - *वाचक* जाप, *उपांशु* जाप और *मानस* जाप।_ *वाचक* _जाप में शब्दों का उच्चारण किया जाता है अर्थात् मन्त्र को मुंह से बोल-बोल कर जाप किया जाता है।_ *उपांशु जाप* _में मंत्र को भीतर से शब्दोच्चारण की क्रिया होती है,जीभ अंदर चलती रहती है,कण्ठ स्थान पर मंत्र के शब्द गूंजते रहते है किन्तु मुख से उच्चारण नहीं किया जाता है।_ *मानस जाप* _में बाहरी और भीतरी शब्दोच्चारण का प्रयास रुक जाता है, सिर्फ मन में णमोकार मंत्र का चिन्तन होता रहता है। यही क्रिया ध्यान का रूप धारण करती है।_ *यशस्तिलक चम्पु* _में कहा गया है -_ *वचसा वा मनसा वा कार्यो जाप्य: सव्याहितस्रान्ते।* *शतगुणमाद्ये पुण्ये सहस्रसंख्यं द्वितीये तु।।* _वाचक जाप से उपांशु जाप में शतगुणा पुण्य और उपांशु जाप की अपेक्षा मानस जाप में सहस्रगुणा पुण्य होता है। मानस जाप ही ध्यान का रूप है, यह अन्तर्जल्प रहित मौन रूप होता है।_ *णमोकार महामंत्र का महात्म्य -* *ऐसो पंच णमोयारो,सव्व पावप्पणासणो।* *मंगलाणं च सव्वेसिं,पढमं होई मंगलं।।* _यह पंच नमस्कार मंत्र सब पापों को नष्ट करने वाला है और सब मंगलों में पहला मंगल है। इसलिए प्रत्येक शुभ कार्य करने के पहले यह मंत्र जरुर बोलना चाहिए।_ _यह मंत्र प्रत्येक मनुष्य पढ़ सकते है। संसार में जितने भी मन्त्रों का प्रचलन है उनमें से यह णमोकार महामंत्र सबसे महान् है। इस मंत्र को प्रतिदिन 108 बार मन लगाकर जाप करने से सभी रोग,संकट, आपत्तियां, दुःख आदि दूर हो जाते है। समस्त सुखों की प्राप्ति होती है और अंत में मोक्ष प्राप्त होता है। अतः प्रतिदिन इस मंत्र को 108 बार अवश्य जपना चाहिए।_ *दु:खे सुखे भयस्थाने,पथि दुर्गे रणेऽपि वा।* *श्री पंचगुरुमंत्रस्य,पाठ: कार्य: पदे पदे।।* _अर्थात् - दुःख में, सुख में,डर के स्थान में, मार्ग में, भयानक स्थान में, युद्ध के मैदान में, कदम-कदम पर णमोकार मंत्र का जाप करना चाहिए।_ _यह महामंत्र तीनों लोकों में अनुपम है,इस मंत्र के समान चमत्कारी और प्रभावशाली अन्य कई मंत्र नहीं है, यह समस्त पापों का अरि है। इस मंत्र का जाप करने से किसी भी प्रकार का पाप नष्ट हुए बिना नहीं रहता है,जिस प्रकार अग्नि का एक कण घांस-फूस के बड़े-बड़े ढेरों को नष्ट कर देता है,उसी प्रकार यह मंत्र सभी तरह के पापों को नष्ट करने वाला होने के कारण पापारि है। यह मंत्र संसार का उच्छेदक, व्यक्ति के भाव संसार राग -द्वेष आदि और द्रव्य संसार ज्ञानावरण आदि कर्मों का विनाशक है,तिक्ष्ण विषों का नाश करने वाला है अर्थात् इस महामंत्र के प्रभाव से सभी प्रकार की विष-बाधाएं दूर हो जाती है। इस मंत्र का भाव सहित उच्चारण करने से कर्मों की निर्जरा होती है तथा योग-निरोध पूर्वक इसका स्मरण करने से कर्मों का विनाश होता है। यह मंत्र सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाला है,भाव सहित और विधि सहित इस मंत्र का अनुष्ठान करने से सभी तरह की लौकिक-अलौकिक सिद्धियां प्राप्त हो जाती है,साधक जिस वस्तु की कामना करता है,वह उसे प्राप्त हो जाती है। दुर्लभ और असम्भव कार्य भी इस महामंत्र की साधना से पूर्ण हो जाते है, यह मंत्र मोक्ष-सुख को उत्पन्न करने वाला है। यह मंत्र केवलज्ञान मंत्र कहलाता है अर्थात् इसके जाप से केवलज्ञान की प्राप्ति होती है तथा यही मंत्र निर्वाण सुख को देने वाला भी है।_ _पवित्र या अपवित्र अथवा सोते, जागते,चलते, फिरते किसी भी अवस्था में इस णमोकार मंत्र का स्मरण करने से आत्मा सर्वपापों से मुक्त हो जाता है,शरीर और मन पवित्र हो जाते है। यह मंत्र आत्मा को पवित्र करने वाला है। यह णमोकार मंत्र अपराजित है, अन्य किसी मंत्र द्वारा इसकी शक्ति प्रतिहत अवरूद्ध नहीं की जा सकती है, इसमें अद्भुत सामर्थ्य निहित है। समस्त विध्नों को क्षणभर में ही दूर किया जा सकता है। जिस प्रकार हलाहल विष तत्काल अपना फल देता है और उसका फल अव्यर्थ होता है,उसी प्रकार णमोकार मंत्र भी तत्काल शुभ पुण्य का आस्रव करता है तथा अशुभोदय के प्रभाव को क्षीण करता है। यह सम्यक्त्व की वृद्धि में सहायक होता है। मनुष्य जीवन-भर पापास्रव करने पर भी अन्तिम समय में इस महामंत्र के स्मरण के प्रभाव से स्वर्गादि सुखों को प्राप्त कर लेता है। यह णमोकार मंत्र सभी प्रकार की आकुलताओं को दूर करने वाला है।_ _मरणोन्मुख कुत्ते को जीवन्धर स्वामी ने करुणावश णमोकार मंत्र सुनाया था,इस मंत्र के प्रभाव से वह पापाचारी श्वान देवता के रूप में उत्पन्न हुआ। अतः सिद्ध है कि यह मंत्र आत्म विशुद्धि का बहुत बड़ा कारण है। णमोकार मंत्र के एक अक्षर का भी भाव सहित स्मरण करने से सात सागर तक भोगा जाने वाला पाप नष्ट हो जाता है, एक पद भाव सहित स्मरण करने से पचास सागर तक भोगे जाने वाले पाप का नाश होता है और समग्र मंत्र का भक्ति भाव सहित विधि पूर्वक स्मरण करने से पांच सौ सागर तक भोगे जाने वाले पाप का नाश हो जाता है। भाव सहित स्मरण किया गया यह णमोकार मंत्र असंख्य दुःखों को क्षय करने वाला तथा इह लौकिक और पारलौकिक समस्त सुखों को देने वाला है। इस पंचमकाल में कल्पवृक्ष के समान सभी मनोरथों को पूर्ण करने वाला यह मंत्र ही है, अतः संसारी प्राणियों को इसका जाप अवश्य करना चाहिए। जिस अज्ञान,पाप और संक्लेश के अन्धकार को सूर्य, चन्द्र और दीपक दूर नहीं कर सकते हैं,उस घने अन्धकार को यह मंत्र नष्ट कर देता है।_ ??????? 2026-04-09 04:40:01